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ज्ञान स्वरोदय।
[१०] नीर चलै जो चंद में, होय समयकी जीत । मेह वरपै परजा सुखी, संवत नीको मीत ॥५१॥ पृथ्वी पानी समान है, होवे चंद अस्थान | दहिने स्वरमें जो चलै, समयो समदम जान ॥५२॥ भोरही सुषमना चले, राज होय उतपात । देखन हारा विनसही, और काल परजात ॥५३॥ राज होय उतपात पुनि, पडे काल विश्वास । मेह नहीं परजा दुखी, होवै तत्त्व अकास ॥५४॥ श्वासा में पावक चलै, पडै काल जब जान । होय रोग परजा दुखी, घटै राज को मान ॥५५॥ भय क्लेश व्है देश में, विग्रह फल जोवंत । पडै काल परजा दुखी, होय वायु को तंत ॥५६॥ संक्रान्ती और चैत को, दीन्हो भेद बताय । जगत काज अबकहत हूं, चंद सुरजको न्याय ।।५७।।
चंद्रयोग के कार्य। योगाभ्यास कीजिये मीता, औषधि वाडी कीजै प्रीता ॥ दीक्षा मंत्र बनिज बियाजा, चंद्रयोग थिर बैठे राजा ॥ चंद्रयोग में अस्थिर जानो, थिर कारज सबही पहिचानो ॥ करै हवेली छपर छवावे, बाग बगीचा गुफा बनावै ॥ हाकिम जाय कोट पर चढ़, चंद्रयोग आसन पग धेरै ॥ सत्य कबीर यह खोज बतावै, चंद्रयोग थिर काज कहावै ॥
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