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________________ [ १० ] वृन्द परास्त हो कर इस उद्घोषणाको सत्य मानते थे कि “ न वीतरागात्परमस्ति दैवतं न चाप्यनेकान्तमृते नयस्थितिः " जिस हरिभद्र सूरिके " नास्माकं सुगतः पिता न रिपवस्तीर्थ्या धनं नैव तै- दत्तं नैव तथा जिनेन न हृतं किञ्चित्कणादादिभिः । किन्त्वेकान्तजगद्धितः स भगवान् वीरों यतचामलं, वाक्यं सर्व मलोपहर्तृ च यतस्तद्भक्ति मन्तो वयम् ||१||" तथा " पक्षपाती न मे वीरे, न द्वेषः कपिलादिषु । युक्तिमद्वचनं यस्य तस्य कार्यः परिग्रहः || २ ||" ऐसे - मध्यस्थ भाव भरे - औदार्य गुणपूर्ण- उद्गारों को सुन सुन आज भी निष्पक्षवादी संसार उन्हें शिर झुकाकर पूज्यपाद - सदा स्मरणीयसंसारके उद्धारक पुरुष - ऐसे २ पवित्र नाम से बुला रहा है । आजके प्रायः साधनप्रचुर संसार में पवित्र धर्म के सिद्धान्तको प्रकट कर दिखाने के लिये ऐसे पुरुषोत्तमावतारकी और " न रागमात्रा त्वयि पक्षपातो, न द्वेषमत्रावरुचिः परेषु । यथाव दासत्वपरीक्षया तु त्वामेव वीरमभुमाश्रयामः ऐसे विश्वजनीन सत्यनादकी गर्जना के करने Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Unwaway. Smartagyanbhandar.com
SR No.034829
Book TitleGirnar Galp
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLalitvijay
PublisherHansvijayji Free Jain Library
Publication Year1921
Total Pages140
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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