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धर्मशिक्षा. करना व्यर्थ ही समझते । हमें बडा अचम्भा होता है कि नास्तिकोंकी अक्ल, लडकोंसे भी क्या कम होगी ? कि वे धूम देखनेसे आगको मालूम नहीं कर सकते; बतलाना चाहिये, धूमके देखने से अदृष्ट आगका जो मानसिक ज्ञान होता है, अर्थात् जहाँ धूमकी अविच्छिन्न शिखा देखी कि झट यह मालूम हो जाता है, कि यहाँ आग जरूर होनी चाहिये, यह जो भान होता है, वह संशय रूप है, या निश्चय रूप ? । अगर संशय रूप कहोगे, तो संशय होनेका कारण बताना चाहिये?, जब कि आगको छोड धूम कहीं जुदा नहीं रहता, तो फिर धूमके देखनेके बाद, आगके अभाव ( नहीं होने ) का अंश, जो संशय-ज्ञान रूप तराजू की एक तुला पर झुल रहा है, वह काहेको झुलेगा ?। संशय तो तब ही जाग उठता है कि दो धर्मोमेंसे, एक धर्मकी निश्चायक पुष्ट सबूत न दिखाई दे, जैसे कि घन अंधकारसे स्पष्ट न दिखाई देती दूर वर्ति, उँची, कुछ चौडी, चीज पर यह सन्देह जरूर जाग उठता है, कि यह वृक्ष होगा, या आदमी ?, क्यों कि यहाँ पर, मनुष्य, और वृक्ष के, कुछ समान धर्म, दिखाई देने, और उसके नियमित विशेष धर्म न दिखाई देनेसे, ऐसा ज्ञान पैदा हो जाता है, जोकि दोला की तरह वृक्ष, और मनुष्य, दोनों तरफ लहरता हैं, मगर प्रकृत में धूम देखने से आगके सन्देह होने का कामही क्या ? कौन सी ऐसी आँच लगती है कि धूमकी जगह पर आगका निश्चय, अच्छी रीतिसे न हो सके । जब समझने वाले यह समझते हैं कि धूम, आगका कार्य है, और कार्य, सिवाय कारण, कभी उत्पन्न नहीं हो सकता, तो फिर, वे लोग, जिस जगह धूम को देखेंगे, वहांपर उनको अग्निका निश्चय होने में कुछ देर लगसकती है ? नहीं, तो चार्वाक लोग, यह कैसे कहते हैं, कि अनुमान कोई प्रमाण नहीं, जब धूम के दर्शन द्वारा आगका
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