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धर्म शिक्षा.
कितने ही लोगोंका कहना होता है कि हिंसक प्राणियोंको मार देना चाहिये, क्योंकि उन्हें मारनेसे बहुतसे जीवों की रक्षा होनेपर पुण्य होता है, मगर यह विचार बिलकुल भद्दा है, बतलाना चाहिये, कौन ऐसे हिंसक प्राणी हैं कि जिन्हें मारनेसे बहुतों का प्रतिपालन होता हो ?, खोजने पर कौन ऐसा प्राणी न मिलेगा, जो कि हिंसा न करता हो ?, चूहा, बिल्ली, कुत्ता, साँप, मोर वगैरह सभी प्राणी, किसी न किसीके हिंसक है ही हैं, तो क्या सभी प्राणियों को मार देना मुनासिव समझते हों, यह तो लाभकी जगह मूलसे नुकशान आया। खयाल करो! कि अहिंसा से पैदा होनेवाला धर्म, किसी भी हिंसा से, क्या कभी पैदा हो सकता है? कदापि नहीं, जलसे पैदा होनेवाले कमल, आगसे हर्गिज उत्पन्न नहीं हो सकते । हिंसा कैसी भी क्यों न हो ?, मगर वह, यदि पापकी माता हो के बैठी है, तो बतलाईए ! उससे कैसे धर्म वा पुण्य हो सकता है ? वह कैसे पापको नष्ट करेगी ?, क्या मौतका हेतुभूत जहर, जीवितके लिये कभी होगा ? । कभी नहीं।
संसार मोचक लोग कहते हैं कि दुःख पाते हुए जीव, मार देने चाहिये, ता कि वे बेचारे दुःखसे फौरन छुट जायँ, मगर यह भी झूठा कथन है, दुःखी प्राणियोंको मार देनेसे, वे दुःखसे छुट जाते हैं, इसमें सबूत क्या ? आपको किस बृहस्पतिके कहनेसे यह श्रद्धा हुई है कि दुःखी प्राणी, अगर एकदम मार दिये जाय, तो वे दुःखसे छूट जाते हैं, क्या मरकर फिर और गति होगी ही नहीं, अगर होगी तो अच्छी ही होगी ?। दुःखी जीवोंको मारनेसे वे मरकरके अगर नरकमें चले जायँगे, तो बतलाईए ! उन दु:खियोंको दुःखसे हटाया, या ज्यादह
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