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धशिक्षा.
३१ उलटा बाहरकी चीजोंको हाथमें लिये हमारे तुम्हारे आगे फिरता है, फिर भी उन्हें नहीं देखना, यह कितनी अंधता कही जाय ? । प्रत्यक्ष प्रमाण ही जब वाहरकी चीजोंको साबीत कर रहा है तो इसमें और प्रमाणकी कोई जरूरत नहीं है। जी ! प्रत्यक्ष तो भ्रान्त है, क्यों ?, आपहीका-जो यह बोल रहे हो!, यह ज्ञान क्यों भ्रान्त नहीं ? । बाह्य चीजोंके द्वारा व्यावहारिक और पारमार्थिक सभी प्रवृत्तियां बन रही हैं, तिसपर भी इन्हें एकदम उडा देना, यह बडा भारी प्रत्यक्षविरोध दोष बौद्धोंके ऊपर बुंबारव कर रहा है।
यह तो निर्विवाद बात है कि ज्ञान मात्र, किसी न किसी विषयको पकडे ही रहता है, नहीं तो लोगोंकी प्रवृत्ति नहीं बनती। अगर कहोगे ! कि भ्रमज्ञानका तो कोई विषय नहीं है अर्थात् भ्रमज्ञान निर्विषय है, तो यह कहना गलत है, क्योंकि रस्सीमें साँपका जो भ्रम होता है, उस भ्रममें साँप विषय पडा है, यदि कहोगे ! कि जिस जगहपर यह ज्ञान हुआ है, वहां कहां साँप बैठा है ? वहां तो रस्सी है, इस लिये भ्रमज्ञान झूठा ज्ञान है; तो समझो ! कि इस ज्ञानको जब झूठा ज्ञान कहते हो तो इससे अतिरिक्त और कोई सच्चा ज्ञान अवश्य होना चाहिये, नहीं तो ' यह झुठा ज्ञान है ' ऐसा व्यवहार कैसे होगा।
जब भ्रान्त और अभ्रान्त ज्ञानकी व्यवस्था मंजूर रक्खी गई है, तो फिर बाह्य चीजोंकी सिद्धि, बौद्धोंकी गोदहीमें भली भांती आ बैठी समझी जाती है। क्योंकि भ्रान्तज्ञान वही है, जो कि सद्भूत विषयको छोड, दूसरे ही विषयको पकड बैठे । जैसे रस्सीमें साँपका ज्ञान । रज्जुके ऊपर नजर किये हुए मनुष्यकी ( रज्जुका उद्देश करके ) ' यह साँप है' ऐसी जो समझ होती
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