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मक्षिक्षा. जीव, पुण्य, पाप, परलोक, मोक्ष वगैरह अदृष्ट पदार्थोंको बिलकुल नहीं मानता है । 'नास्तिकं तु न दर्शनम् ' इस वाक्य प्रघोषसे भी नास्तिक मत, दर्शनोंकी गिनतीमें है ही नहीं। क्योंकि नास्तिकोंके विचार सरासर झूठे हैं । दुनियाँमें, एक राजा, एक दरिद्र, एक शेठ, एक नौकर, एक सुखी, एक दुःखी, एक धनी, एक गरीव, एक पंडित, एक मूर्ख, इत्यादि अनंत विचित्रताएं जब प्रत्यक्ष दिखाई देती हैं, तो सिवाय पुण्य, पाप, ये विचित्रताएं किससे सिद्ध की जा सकती हैं ? । इसलिये इस स्फुट विषयमें ज्यादह दलीलें देनी जरूरकी नहीं समझते । _अब रहा बौद्धदर्शन, उसके भी सिद्धान्त समालोचना करनेपर नहीं ठहर सकते । बौद्धोंके हिसाबसे सब चीजें सर्वथा क्षणिक हैं; मगर एक ही चीज, बहुत दिनपर, बहुत महीनेपर,
और बहुत वर्ष पर भी जब बराबर ' वही यह है '. इस आकारसे पहचानी जाती है, तो यह बात, सब चीजोंको सर्वथा क्षणिक मानने पर कैसे बनेगी ? । क्या पहले क्षणमें देखा हुआ घट, दूसरे क्षणमें है ही नहीं ?, अगर यही वात हो, तब तो जगद्व्यवहार लुप्त हो जायगा।
बालक भी यह समझता है कि थोडे दिनोंके लिये किसी मनुष्यके पाससे कोई चीज ली जाती है, वह चीज वापीस उसको अवश्य देनी पड़ती है, परंतु बौद्धोंके विचारसे लेनेवाला पुरुष, वह चीज मालिकको वापीस कैसे देगा ? यही क्यों न कह देगा? कि आपकी चीज लेते वक्त ही उड गई, यह चीज तो दूसरी है।
दूसरे क्षणमें सर्वथा वस्तुका नाश मानने वालोंने व्यवहार देवताका मुँह तोड दिया है। अगर बौद्धोंका यह अभिप्राय हो कि सभी चीजें उत्पन्न होनेके समयमें क्षण-विनश्वर स्वभावको लेकर ही पैदा
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