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________________ १४ धशिक्षा. वेदान्तादि दर्शन शास्त्र भी अशुद्ध क्यों नहीं होंगे, क्या मूल अशुद्ध होनेसे शाखा अशुद्ध नहीं होगी ? । अव्वल तो वेदमें भरी हुई हिंसा ही वेदकी अपवित्रता बता रही है। जिसने वेदको तत्त्व दृष्टिसे देखा होगा वह पुरुष कदापि वेदको शुद्ध नहीं कहेगा । ____ लीजिये ! वेदकी खुशबूछागादीनां वधः स्वर्ग्यः । पापघ्नो गोस्पर्शः। द्रुमाणां पूजा । ब्राह्मणपूजनम् । पितृप्रीणनम् । वन्हो हुतं देवप्रीतिप्रदम् । इत्यादि __ अर्थ-छाग ( बकरा ) आदि पशुओंका वध करना स्वर्म के लिये है। गो (गाय) का स्पर्श पाप नाशक होता है । वृक्षोंकी पूजा करनी चाहिये। ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। पितृ लोगोंको तर्पण करना चाहिये । अग्निमें द्रव्यका होम करना देवोंकी प्रीतिके लिये होता है । इत्यादि। ऐसे ऐसे असंबद्ध वाक्योंसे भरे हुए वेदको कौन पंडित पुरुष प्रामाणिक मान सकता है ? क्यों कि प्राणी की हिंसा करना सर्वथा अधर्म है तो फिर पशु हिंसा को धर्म बताने वाला वेद दयालु महात्मासे बना हुआ कौन स्वीकारेगा ?। पशुओंकी हत्या करना-बुरी हालतसे पशुओंकी जान निकालना और दया धर्मका दावा करना यह बात कैसे हो सकेगी? । सर्व प्राणीयोके प्राण एक समान हैं यानि सब जीवों को सुख प्रिय होता है और दुःख अप्रिय होता है फिर भी जीवोंका संहार करना इसको धर्म कौन मानेगा। अव्वल ईश्वरकी पूजा जीवोंकी रक्षा करनी ही है। जीवोंकी हिंसा किसी भी प्रकारकी वेदकार बतलाता हो लेकिन सर्व प्रकारेण पशु हत्या करना कुकर्म ही है। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034803
Book TitleDharmshiksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNyayavijay
PublisherGulabchand Lallubhai Shah
Publication Year1915
Total Pages212
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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