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धर्मशिक्षा.
शानी-हे देवानुप्रिय! आपकी जिज्ञासा प्रशंसनीय है। सचमुच उक्त छ दर्शन परस्पर विरोध रखते हैं तथाहि
नैयायिक तथा वैशेषिक दर्शनका तंत्र परस्पर बहुत समान होनेपर भी अवान्तरविरोध उन्होंके शास्त्रोमें प्रकट दीख पड़ते हैं। अव्वल तो प्रमाणकी व्यवस्थामें उन दोनोंका विरोध है। नैयायिकोंने प्रत्यक्ष अनुमान उपमान और शब्द इन चार प्रमाणोंको स्वीकारा, तब वैशेषिकोंने प्रत्यक्ष और अनुमान ये दोही प्रमाण माने। उसी प्रकारसे पदार्थ व्यवस्थामें भी प्रकट ही विरोध है। सांख्यकी प्रक्रिया उन्होंसे बिलकुल विपरीत है। जब वैशेषिकोंने पृथ्वी-जल-तेजवायुः-और आकाशका क्रमसे गन्ध-रस-रूप-स्पर्श और-शब्दको गुण माना, तब सांख्याचार्यों ने मन्ध-रस-रूप-स्पर्श-शब्दोंकी तन्मात्राओंसे पृथ्वी-जल-तेज-वायु:-और आकाशकी उत्पत्ति स्वीकारी । देखिये ! पाठकगण! है न पहाड जितना विरोध ? । औरभी सुनिये ! जगत्की उत्पत्तिका निमित्त कारण ईश्वर है ऐसा वैशेषिकोंने कहा, तब सांख्य प्रवचनमें ईश्वर मानाही नहीं, किन्तु सत्त्वरजस्तमोगुणात्मक प्रकृतिका संक्षोभ होने पर जगतकी व्यवस्था मानी।
अब जैमिनीय दर्शनमें गौर कियाजाय तो वहांभी बडीही विलक्षणता दिखाई देती है। पहिले तो जैमिनीय दर्शनमें सर्वश ही नहीं माना है। जैमिनीयका दूसरा नाम मीमांसक है। मीमांसक दो प्रकारका है, एक पूर्व मीमांसक और दूसरा उत्तर मीमांसक । पूर्व मीमांसक प्राधान्येन क्रियाकांडी है । और उत्तर मीमांसक वेदान्ती है। वेदान्ति लोगोंने एक सत्य ब्रह्महीको माना और
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