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________________ धर्मशिक्षा. उत्पन्न होवे उन सबको अपनी आत्मा में रखना चाहिये । पूर्णचिन्ता करके युक्त मालूम होने पर उनको जाहिरमें लाना मुनासिब है, छद्मस्थों को सहस्रशः नम हो जाता है । विचारना चाहिये कि यदि भ्रम से असत्यवस्तुको सत्य मानकर प्रचलित करेंगे तो बहुत संसारकी द्धि होगी। और ऐसे भवभीरु होना यह आत्माका प्रथम गुण है । जो शख्स नये मत निकालने में अपनी पूजा समझता है वहधर्मका परमशत्रु है। क्योंकि नया धर्म कोई नहीं निकाल सकता । सर्वज्ञ सर्वदशीभी पूर्व प्रसिक ही धर्ममार्गको प्रकाशित करते हैं, जैसे जीव अनादि है, मोक्ष अनादि है, वैसे धर्मभी अनादि है । धर्मका अपूर्व प्रादुर्भाव यदि माना जाय तो मोक्ष प्रवाह अनादि नहीं हो सकेगा, क्योंकि धर्मके अपूर्व प्रादुर्भाव समय के पहिले धर्मका अभाव होनेसे निष्कारण मोक्ष रूप फल नहीं बन सकता। अतः धर्म और मोक्षका प्रवाह अनादि कालसे चला आरहाहै । अलबत्ते कचित् क्षेत्रादि दोषोंसे धर्मका अभाव होसकता है। मगर धर्मका अपूर्व प्रादुर्भाव होना सर्वथा असंभव है । जब यह वात निश्चित हो गई, तो फिर नया मत खडाकर देना यह अन्बल पाखंड नहीं तो दूसरा क्या ? पाखंडि लोग अपना पाखंड फैलाकर दुनियाको ठगते हैं. असत्य उपदेश देकर प्रजाको उर्गतिमें गिराते हैं और ॥ स्वयं नष्टा दुरात्मानो नाशयन्ति परानपि ॥ इसन्यायको चरितार्थ करते हैं। यदि कहा जाय कि हम नया मत नहीं निकालते हैं किन्तु शास्त्रोंका परमार्थ बताकर प्रजाको तत्वज्ञानिनी बनानेकी कोशिश करते हैं, तो ये सबवातें झूठ हैं। शास्त्रोंका परमार्थ निकालना बडी विद्वत्ताका काम है। अज्ञा Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034803
Book TitleDharmshiksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNyayavijay
PublisherGulabchand Lallubhai Shah
Publication Year1915
Total Pages212
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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