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धर्मविधा.
१७१ “सर्वविरतिलालसः खलु देशविरतिपरिणामः, यतिधर्मानुरागरहितानां तु गृहस्थानां देशविरतिरपि न सम्यग् ”। ____ अर्थात् “ देशविरति परिणाम जो है, वह सर्वविरति की अभिलाषा करके सम्बद्ध है, यानी मुनिधर्म पर अनुराग नहीं रखनेवालों को देशविरति का भी यथार्थ लाभ नहीं है " । साधु होना न होना यह बात दूसरी है, मगर “साधुधर्म कब उदयमें आवे" यह भावना तो श्रावकों को पूरी रहती है, पीछे भले ही अन्तराय बलसे साधु होनेका मौका न मिले-साधुत्व प्राप्त न होवे ।
इससे यह बात हुई कि श्रावक लोगों को साधुधर्म जब प्यारा है, तो साधुधर्म की पूर्ण मौज नहीं उठा सकने वालोंको पोसह कर के भी मुनि धर्म के आनन्द का दिगनुभव लेना अति जरूरी है। कह भी गये हैं कि पोसह क्या है मानो! अमुक दिन की प्रवज्या है। क्या महीने भर में दो दिन एक दिन भी ऐसा नहीं निकाल सकते कि संसार की उपाधियोंको छोडकर पोसह लिया जाय ?।
तेली के बैल की तरह संसारचक्र में सारी जिन्दगी चकर खानेवाले, मोह दावानल पर अपनी आत्मा को बेहद्द रडानेवाले गदहे की तरह अपनी पीठपर संसार के बोझ से हमेशा लदे रहनेवाले कृष्ण लेश्या की उग्रता से भिल्ल सरीखे दिखाई देनेवाले, महा मोहान्ध मनुष्य जाति मात्रसे भले ही मनुष्य कहलाओ ! मगर वास्तवमें गुण नय से पशु ही है, या यों कहिए ! जंगली मनुष्य हैं। गुणवंत पशु पक्षी अच्छे, मगर निर्गुणी मोहान्ध मनुष्य अच्छे नहीं । वे लोग उनकी माँ के पेट पर पत्थर अवतरे हैं, जो मोह रूपी विष्ठा में स्वांगीणतया मग्न रहते हुए धर्म की तर्फे नजर नहीं
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