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________________ १४८ धर्मशिक्षा. चीजें खाउँगा, ज्यादह नहीं । पंचमी अष्टमी एकादशी चतुर्दशी वगैरह तिथि दिनों पर सचित्त का बिल्कुल त्याग करना जरूरी है। महोने भरमें बार दिन दश दिन आखिरमें पांच दिन तक भी सचित्त का त्याग न हो, तो कितनी निर्बलता ? खैर ! मगर अभक्ष्य चीजें हर्गिज नहीं खानी चाहिएँ । सुनिए ! बाईस अभक्ष्योंके नाम १ वड के पीपल के ३ पिलखण के ४ कठंबर के ५ और गूलर के फल ये पांच प्रकारके फल अभक्ष्य हैं । इनमें बहुत सूक्ष्म कीडे-त्रसजीव भरे हुए रहते हैं, इसलिये इन्हें धर्मात्मा पुरुष नहीं खा सकते । ६ मदिरा ७ मांस ८ मधु ९ मक्खन । इन चार अभक्ष्यों में तद्वर्ण असंख्य जीव उत्पन्न होते हैं । ये चार महा विगय कहलाती हैं । इन महा विगयोंसे काम विकार को उत्तेजन मिलता है। दखिए ! शराब की दुर्दशामदिरा के पीने मात्र से बुद्धि नष्ट हो जाती है, जैसे दुभांगी पुरुषको सुन्दर औरत छोड दे । मदिरा पान के परतंत्र दिल वाले पापात्मा लोग, अपनी माता को औरत समझते हैं, और अपनी औरतको माता के समान जान लेते हैं । मद्य पीनेवाले मृढ पुरुष को स्व-परका भान नहीं रहता, यहां तक कि अपने को स्वामी समझ बैठता है, और स्वामी को किंकर समझ लेता है। शराबी आदमी, शराबके जरिये से इसकदर बेभान बन जाता है कि बाजार के बीचमें मुडदे की भांति लेट जाता है, और उसके मुँहमें कुने आके मूत जाते हैं। मद्यका व्यसनी मनुष्य Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034803
Book TitleDharmshiksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNyayavijay
PublisherGulabchand Lallubhai Shah
Publication Year1915
Total Pages212
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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