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________________ ( २ ) प्रायः सभी धर्मोंने इन मार्गोंको अपनाया है। किसीने संन्यास को प्रधानता दी है और किसीने कर्मयोग को। अब हम संसारके मुख्य धर्मों में प्रचलित संन्यास प्रथाका संक्षेपसे दिग्दर्शन कराना चाहते हैं। इस्लाम धर्म इस्लामके सिद्धान्तानुसार संन्यासका कोई महत्व नहीं है। इस धर्मके फरमानके अनुसार संन्यास न लेना चाहिये । पैगम्बर साहेबने स्वयं फरमान किया है कि खुदाने मनुष्यके लिए जो जो उपयोगी वस्तुएँ बनाई हैं, उन्हें भोगनेका निषेध न करना चाहिए । रमजानके दिनोंमें उपवास करना, शराब नहीं पीना, पाँच वार नमाज पढ़ना, मकेकी यात्रा करना मादि जो फरमान पैगम्बर साहेबने किये हैं, वे संसारमें रहकर धार्मिक जीवन बितानेके लिए हैं। संसारका त्याग करके संन्यासी बन जानेका फरमान कहीं नहीं है। इस्लाम धर्ममें मुल्ला, मौलवी, मौलाना, पीर वगैरह नाम वाले विद्वान् धर्मगुरु होते हैं, लेकिन वे विवाह करके गृहस्थके रूपमें रह सकते हैं। उनके लिए घरबार छोड़नेका विधान नहीं है। धार्मिक क्षेत्रमें इन्ही का सर्वोच्च स्थान है। इनके सिवाय दरवेश, फकीर वगैरह नामसे अर्धनग्न अवस्था विचित्र वेश पहने हुए जो व्यक्ति इधर उधर फिरते दिखाई देते हैं, वे भी घरबारीके रूपमें रह सकते हैं। उनमेंसे कुछ फक्कड़ ( कुंवारा ) भी रहते हैं, किन्तु इस प्रकार रहना इस्लाम धर्मसे अनुमत नहीं है। फकीरोंमें दो विभाग होते हैं-बेशरा अर्थात् शरा (धर्मनियम) के विरुद्ध चलने वाले और बासरा अर्थात् शराके अनु Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034760
Book TitleBaldiksha Vivechan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorIndrachandra Shastri
PublisherChampalal Banthiya
Publication Year1944
Total Pages76
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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