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________________ RECE ॐ एक रथरेणू, आठ रथरेणूए देवकुरु उत्तरकुरु मनुष्यनो एक वालाग्र, आठ देवकुरुउत्तरकुरुमनुष्यना वालाग्रे हरिवास रम्यक्वासमनुष्यनो एक वालाग्र, आठ हरिवासरम्यश्वासक्षेत्रना मनुष्यना वालाग्रे हेमवंतएरण्यवंत जुगलीयानो एक वालाग्र, आठ हेमवंतएरण्यवंत मनुप्यना वालाग्रे पूर्वमहाविदेह पश्चिममहाविदेह मनुष्यनो एक वालाग्र थाय, आठ पूर्वविदेह पश्चिमविदेहना मनुष्यना वालाग्रे भरत ऐरवत क्षेत्रना मनुष्यनो एक वालाग्र थाय, आठ भरत ऐवन मनुष्यना वाला एक लिख थाय, आठ लिखनी एक ज़, आठ जए एक यवमध्य, आठ यवे एक उत्सेधांगुल थाय । ३ ॥ हवे आत्मांगुलनु म्वरूप ग्रंथकार बतावे छेजे जम्मि जुगे पुरिसा अट्ठसयांगुलसमूच्छिया हुन्ति। तेसिं जं नियमंगुलमायंगुलमित्थ तं होई ॥४॥ जे पुण एय पमाणं ऊणा अहिया व तेसिं मेयं तु । आयंगुलं न भण्णइ किंतु तदाभासमेवत्ति ॥५॥ अर्थ-जे युगने विषे पुरुष एकसोआठ अंगुल उंचो होय तेनो जे अंगुल ते आत्मांगुल कहेवाय (भरतचक्रवत्ती विगेरेनो)।४ाजे पुनः वली ए प्रमाण १०८ अंगुलरूप थकी उना अथवा अधिका होय तेहने आत्मांगुल न कहीये. किंतु आत्मांगुलाभास कहीए एटले आत्मांगुल सरिखं दीसे छे पण आत्मांगुल नहि. ॥ ८ ॥ हवे प्रमाणांगुल वखाणे छे. जं भरहस्सायंगुलमेयं तु पमाणअंगुलं होइ । उस्सेहंगुलचउसयमाणा सूई इहं भणिया ॥६॥ अर्थ-भरतचक्रीन आत्मांगुल ते प्रमाण अंगुल थाय. चारसो उन्सेधांगुले एक मूची प्रमाणांगुल होय. इह प्रमाणअंगुलने विषे मृची कही ते लांबपणे चारसो उत्सेधांगुल जेटलं लांवपणु थाय तेटल प्रमाणअंगुलनु लांबपणुं थाय. ए प्रमाणअंगुलनी लंबाइ कही.॥६॥ हवे प्रमाणांगुलनु जाडपणु तथा पहोलाइ कहे छे. एगंगुलबाहुल्लं अड्ढाइयमंगुलाई तं पिहुलं । एवं च खित्तगणिए उस्सेहंगुलसहस्सं तं ॥७॥ SCARRIER ARSASARAS545k Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara. Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034744
Book TitleAngulsattari
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMunichandrasuri
PublisherMahavir Jain Sabha
Publication Year1918
Total Pages16
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size2 MB
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