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________________ अंधिकमास निर्णय. mmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmm देवद्रव्यपर सबका समान हकहै. कोइ श्रावक किसी दुसरे श्रावकको एसा नही कहसकताकि आपका इसमे हक नही. इतना लिखनेका मतलब यह हुवा कि हरेक जैन मुनि जैन साधवी श्रावक या श्राविकाको मुताबिक जैनशाखके फरमानपर अमल करना चाहिये. अछा! अब सवालकर्ताने जो सात सवाल पुछे है उनका माकुल जवाब देताहुँ सुनिये. ३०-सवालकर्ता अपने सवालोकी शुरुआतमे लिखतेहै. न्यायरत्नजी और पं० आनंदसागरजीको सूचना. ( जवाब. ) कहिये ! आपकी क्या ! सूचना है? न्यायरत्नके पास माकुल जवाबोंकी कमी नहीं है. ___आगे सवालकर्ता इस मजमूनको पेंशकरतेहै. वर्तमानमें लौकिक टिप्पनके आधारसे पहले भादवेमें पयूषण करना.या दुसरेमें? यह चर्चा चलरही है.. (जवाब.) चलरही है तो चलने दो. मगर यह बतलाइये! जैन पंचांगकी रुहसे इसवसमें दो भाद्रपद महिने नहीथे. लौकिक पंचांगकी रुहसे दो भादवे थे. बातकरना जैनशास्त्र कल्पसूत्रकी और चलना लौकिक पंचांगपर इसकी क्या! वजहहै ? खरतरगछ, अंचलगछ और लोंकागछवाले जैनशाख कल्पसूत्रके (५०) दिनकी बातको आगे लातेहै तो फिर लौकिक पंचांगपर क्यों चलतेहै ? फिर सवालकर्ता तेहरीर करतेहै. अधिकमासके विषयमेही कायम रहना युक्तियुक्त है. ( जवाब.) में इसी बातपर कायमहुं, और इसी लिये यह ___Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034727
Book TitleAdhik Mas Nirnay
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShantivijay
PublisherShivdanji Premaji Gotiwale
Publication Year1917
Total Pages38
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size4 MB
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