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________________ ( ५७ ) इस विषय पर आपका बड़ा ही प्रभावशाली व्याख्यान हुआ। इस अवसरपर महाराणा साहेबके ज्येष्ठभ्राता श्रीयुत सूरतसिंहजी भी उपस्थित थे । इस व्याख्यान का उनपर बड़ा प्रभाव पड़ा, उन्होंने उठ कर आपके उपदेशका बड़े ही समुचित शब्दोंमें स्वागत किया । यहांपर अनागत चौबीसीमें होनेवाले श्री पद्मनाभ प्रभु के विशाल मंदिरमें पूजा पढ़ाई गई । साधर्मिक वात्सल्य भी बड़े समारोह से हुआ। यहांसे बिहार करके आप देवाली ग्राममें पधारे । यहां के श्रावकोंने आपके प्रति अपना बड़ा ही भक्तिभाव प्रगट किया । आपके आगमनकी खुशीमें भगवान् के मंदिरमें बड़े ही ठाठसे पूजा पढ़ाई और साधर्मिक वात्सल्य भी किया । वहांसे आप भुवाणा ग्राममें पधारे। यहां पर उदयपुर के सहस्र स्त्री-पुरुष आपके दर्शनार्थ आये और उन सबका, शेठ रोशनलालजी चतुर आदिकी तरफसे बड़ा स्वागत किया गया अर्थात् पूजा, एवं साधर्मिक वात्सल्य किया गया । यहां से आप एकलिंग ग्राममें श्री शान्तिनाथ प्रभुके दर्शनार्थ पधारे। यह बड़ा प्राचीन स्थान है। कहते हैं कि किसी समय इस ग्राममें ३५० जैनमंदिर थे; परंतु अबतो सब खंडरात ही दिखाई देते हैं और सैंकड़ो खंडित मूर्तियां पड़ी हुई दृष्टिगो चर होती हैं। समय बड़ा बली है। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034725
Book TitleAdorshopadhyay arthat Sohanvijayji Maharaj ka Jivan Vruttant
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHansraj Pt
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1936
Total Pages254
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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