SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 85
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ( ५६ ) चातुर्मास में अट्ठाई महोत्सव-पूजा-प्रभावनादि कार्य भी आनंदसे होते रहे। उपदेशके लिये आप राजमहलमें भी पधारे और ( वर्तमान महाराणा )राज कुमार श्री भूपालसिंहजी को धर्मोपदेश दिया। आपकी शोभाको सुनकर महाराणा उदयपुरके ज्येष्ठभ्राता श्रीयुत सूरतसिंहजी आपके दर्शनार्थ उपाश्रयमें पधारे । अनुमान एक घंटेतक आपने उनको धर्मोपदेश दिया और परस्परमें धर्मचर्चा करते रहे । महाराणा साहिब के भ्राता आपसे मिलकर बड़े प्रसन्न हुए । यतः ___ सतांहि वाणी गुणमेव भाषते । चातुर्मासकी समाप्तिपर विहार करके नगरके बाहर एक जैन धर्मशालामें आप पधारे और " जैनोंका अहिंसा तत्व" * इस वक्त आपश्रीजी का दिया हुआ धर्मोपदेश अभीतक मेवाड़ाधिपति महाराणा साहिबके हृदयपट्ट पर अंकित है। सं. १९८८ में पूज्यपाद परमगुरुदेव १००८ श्रीमद्विजयवल्लभसूरिजी महाराज दक्षिणदेशसे विचरते हुए श्री केशरियाजीकी यात्रा करके उदयपुर पधारे तब श्रीयुत महाराणा साहिक्की मुलाकात के लिए राजमहेलमें पधारकर पुण्यपाप के विषयमें स्वयम् श्रीमान् महाराणा साहिब का उदाहरण देकर पुण्यपाप के विषयको स्पष्ट प्रकारसे प्रतिपादन करते हुवे सच्चा उपदेश दिया जिसका प्रभाव महाराणा साहिब पर अच्छा पड़ा। इस समय अपने चरित्रनायक श्री सोहनविजयजी महाराजको महाराणा साहिबने याद किया। इससे पता चलता है कि स्व. उपाध्यायजी के व्यकतित्व का कितना प्रभाव था। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034725
Book TitleAdorshopadhyay arthat Sohanvijayji Maharaj ka Jivan Vruttant
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHansraj Pt
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1936
Total Pages254
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy