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( ५५ ) धर्मोपदेश देते हुए आप भारतवर्ष के सर्वप्रधान, सुविख्यात तीर्थश्री केसरियानाथजी पधारे ।
यह तीर्थ अपनी महिमामें अनुपम है। यहां श्री आदीश्वर भगवान्की बड़ी ही विशाल और भव्यमूर्ति है। इसकी प्राचीनताके विषय में तो यहांतक कहाजाता है कि यहमूर्ति रावण के हाथकी बनवाई हुई है।
यहां से आप उदयपुर शहर में पधारे और सं. १९७५ का चातुर्मास आपका यहांपर हुआ। आपके चातुर्मास करने से यहां पर कई प्रकारके सुधार हुए । विवाह में वेश्यानृत्य का रिवाज दूर किया गया, बालविवाहकी प्रथाको रोकनेका प्रबन्ध किया गया। इसके सिवाय यहांपर वृद्ध अथवा युवा कोईभी मरजाता तो बिरादरी के लोग मिलकर मोतीचूर के लड्डू उडाया करते थे; चाहे किसी जवान लड़केकी विधवा स्त्री घरमें बैठी आहें भर रही हो, मगर बिरादरी में तो जीमणवार होताही था। परन्तु आपके सदुपदेश से यह प्रथा अधिकांश में दूर हो गई और एक स्वयंसेवक मंडल की स्थापना की गई । क्यों न हो, जब कि मनुष्य किसी बात पर उतारू हो जाता है तो उसे करके ही छोड़ता है चाहे वह कितनी ही कठिन हो। इस पर एक कविने क्या ही अच्छा कहा है; " वह कौनसा उकदा है जो वा हो नहीं सकता ! हिम्मत करे इन्सान तो क्या हो नहीं सकता,"।
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