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________________ (४५) कथनका सबने अनुमोदन किया, और इस प्रकार आपका १९७२ का चतुर्मास अबदनावर में हुआ । आपके चतुर्मासमें जनता को धर्मोपदेशका बहुत लाभ हुआ । पर्यषणा-पर्वका आराधन बड़े ही उत्साह और समारोहसे हुआ । भाद्रपद शुक्ला २ के रोज़ रथयात्रा का समारोह भी बड़ी धूम-धामसे हुआ । रतलाम स्टेटसे हाथी, तथा ग्वालियर स्टेट के बड़नगर शहर पालकी, डंका और निशान. आदि सब आये थे। तथा रतलाम, बड़नगर, कानवन और मुलथान आदि नगरोंसे भी बहुतसी संख्यामें स्त्री-पुरुषोंका आगमन हुआ था । यह यात्रा महोत्सव हरएक दृष्टिसे अपूर्व था । विपक्षि लोगोंने यद्यपि इसमें अनेक प्रकारकी विघ्नबाधाएँ उपस्थित की; परन्तु आपके पुण्य और धर्मके प्रभावसे उत्सवमें आशासे अधिक सफलता हुई। जैसे कहा भी है कि “ यतो धर्मः ततो जयः”। प्रतिदिन आपके व्याख्यानमें सैंकड़ों स्त्री-पुरुषोंकी भीड़भाड़ रहती थी। विपक्षि लोगोंके प्रश्नोंका उत्तर भी आप बड़ी प्रौढ़तासे देते थे । आपके उपदेशसे यहांपर देवमंदिरोंके * यह नगर किसी समय जैन धर्मका केन्द्र रह चुका है; अभी. तक कितने ही जैन मंदिरों के खंडहर नज़र आते हैं और जैन मूर्तियाँ भी जमीनसे यत्रतत्र निकली हैं । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034725
Book TitleAdorshopadhyay arthat Sohanvijayji Maharaj ka Jivan Vruttant
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHansraj Pt
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1936
Total Pages254
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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