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________________ (४४) और आज्ञा के लिये प्रार्थना की । महाराजश्रीने लाभालाभ के तारतम्यपर विचार कर बदनावरमें चतुर्मास करने की आज्ञा देदी । बस फिर क्या था ? इन लोगों के आनन्दका कोई पार न रहा । तुरन्त ही बदनावर को तारद्वारा सूचना देदी गई । तारद्वारा सूचना मिलने से लोगों को बड़ाही हर्ष हुआ और प्रत्येक मनुष्य अपने भाग्य की सराहना करने लगा ! परन्तु विहार करके आप वड़नगरमें पधार गये थे, इस लिये वे लोग गुरुमहाराजका आज्ञापत्र लेकर वहां पहुंचे और आज्ञापत्र आपकी सेवामें अर्पण किया । आज्ञापत्र को शिरोधार्य करते हुए आपने बड़नगर के श्री संघको प्रेम भरे शब्दों में सम्बोधन करते हुए कहा कि सज्जनो ! आप लोगों के प्रेम, श्रद्धा, भक्ति और उत्साहमें किसी प्रकारकी कमी नहीं, तथा इसी बलवती सामग्रीने मुझे यहांपर चतुर्मास करनेके लिये मजबूर भी किया, परन्तु क्या किया जावे ? भावीभाव बलवान् है यहां की क्षेत्र फर्सना बलवती नहीं, गुरुमहाराजका आज्ञापत्र आप लोगोंके सामने है । उसकी अवहेलना करना मेरे लिये श्रेयस्कर नहीं एवं उस क्षेत्रमें भी लाभकी ही अधिकांश संभावना है। ___ अतः आप लोग भी यदि वहांके लिये अपने प्रसन्न. चित्तसे अनुमति दे देवें तो बड़ाही अच्छा हो । आपके इस Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034725
Book TitleAdorshopadhyay arthat Sohanvijayji Maharaj ka Jivan Vruttant
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHansraj Pt
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1936
Total Pages254
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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