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(२७) गुरुदेव के साथ ही आप भी संमिलित हुए और आपने आनंद से तीर्थराज की यात्रा की ।
__ यहां पर आप को पालनपुर वाली बीमारी फिरसे हो गयी, तो भी हिम्मत करके श्री गुरुदेव के साथ ही साथ भावनगर पधारे । दैवयोगसे यहां पर एक अनुभवी वैद्यराज मिल गये। उनकी दवा लेने से रोग जडमूल से नष्ट हो गया। " शुभ कर्मोदय आते हैं तब निमित्त भी वैसे ही मिल जाते हैं"।
पूज्यपाद १००८ गणि श्री मुक्तिविजयजी ("मूलचंदजी") महाराज के पट्टधर आचार्य श्रीमद्विजयकमलसूरिजी महाराज के हस्त कमलोंसे श्री गुरुदेव के समक्ष मुनि श्रीमित्रविजयजी की बड़ी दीक्षा का संपादन यहां ही करवाया गया ।
यहां से श्री गुरुदेव के साथ बिहार कर के श्री गुरुदेव की पवित्र जन्म भूमि वीरक्षेत्र बड़ौदा में पधारे ।
वि. सं. १९६७ का चातुर्मास यहां ही श्री गुरुदेव की पवित्र सेवा में रह कर व्यतीत किया ।
“योगोद्बहन" बड़ौदाके चातुर्मासमें गुरुमहाराज के छठे गुरुभ्राता मुनिश्री मोतीविजयजी के पास आपने उत्तराध्ययन और
आचारांगसूत्रादि के योगोद्वहन किये। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com