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________________ ( २६ ) का अमृतसर, ६५ का गुजरांवाला और ६६ का पालनपुर [गुजरात ] में हुआ। इतने समयमें आपने पूज्य गुरुदेवकी सेवामें रह कर विद्याभ्यास के साथ ही साथ निष्काम गुरुभक्तिसे अपनी आत्मा को भी खूब पवित्र किया । "शिष्यप्राप्ति" पालनपुर के चातुर्मासमें आप सख्त बीमार हो गये, परन्तु कुछ दिन बाद अच्छे हो गये । चौमासे के बाद बड़ौदा निवासी एक युवक श्रीयुत नाथालालभाई की दीक्षा का समारोह हुआ और वे नाथालालभाई आप के ही शिष्य बने,* उनका नाम मित्रविजयजी रखा गया । " संघ के साथ श्री सिद्धाचलजी की यात्रा" वपुः पवित्रीकुरु तीर्थयात्रया, चित्तं पवित्रीकुरु धर्मवाञ्छया । वित्तं पवित्रीकुरु पात्रदानतः, कुलं पवित्री कुरुसच्चरित्रैः ॥ दीक्षा महोत्सव के बाद राधनपुर से “गुजरात के " सुप्रसिद्ध शेठ मोतीलाल मूळजीने श्री सिद्धाचलजी तीर्थ की यात्रा के लिए एक विशाल संघ निकाला । उसमें पूज्यपाद श्री *मासर "गु. कार्तिक" कृष्णा द्वितीया के दिन, Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034725
Book TitleAdorshopadhyay arthat Sohanvijayji Maharaj ka Jivan Vruttant
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHansraj Pt
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1936
Total Pages254
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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