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( १९० ) मेरे प्यारे बन्धु, मेरे हृदय मानसके हंस, भावीकालके पंजाब के मुनिसिंहने शान्तिपूर्वक मेरे सामने बैठ कर अथ से इति तक ( अलिफ से ये तक ) अपनी सारी आत्मकथा कह सुनाई और कहा, "मैं जम्बू(काश्मीर)का रहनेवाला ओसवालका लड़का हूं, और मेरा नाम वसंतामल है। मैंने स्थानकवासी संप्रदायमें समाना ( पटियाला ) में दीक्षा लीथी, वह संप्रदाय मुझे रुचिकर नहीं हुआ, मैं उसे छोड़कर गुरु महाराजके पास आया और गुरु महाराजने पंजाबके अगुआ श्रावक लाला गंगाराम बनारसीदास से कहकर मुझे आपके पास भेजा है"। उस समय भी उस नरवीर की अकिंचनता को देख कर परमपूज्य श्री हंसविजयजी महाराज और मैं आश्चर्यचकित होते थे, क्योंकि उनका रहन सहन बिल्कुल ही सादा था । तनपर एक साधारण मलमलका कुर्ता, सिरपर दो पैसे की युक्त प्रान्त की टोपी और कमर में एक धोती थी । हम दोनों बन्धु आनन्द से दिन गुजारने लगे।
इसके एक दो दिन बाद ही आचार्य महाराज श्री विजयवल्लभसूरीश्वरजी महाराज, जो उस समय संसार की दृष्टिमें एक साधारण साधु की हैसियत में थे, उनका कृपा पत्र आया; जिसमें लिखा था कि “ ललितविजय योग्य सुखसाता अनुवंदना के साथ मालूम रहे कि इस व्यक्ति (वसंतामल) को तेरे पास भेजा है। इसको अपने नाम की दीक्षा देकर अपने साथ रखना, पढ़ाना, लिखाना और स्नेह से रखना । यह
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