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________________ ( १६४ ) गीतिं च गास्यामः इत्थम् ॥ यद्वतकृतामृता स्यादसेवनाद्धौतर्किविसा एक्ये स्थितामताः सर्वे जीवन्तु शरदः शतम् । इतिशमभीप्सिवो वयं प्रार्थयामः सनक्षत्र निवासिनः कृष्णदत्तप्रभृतयः । सं० १९७९ जेठ ५ मी । ॥ समाप्तमदोऽभिनन्दनपत्रम् ॥ हिंदी अनुवाद. तुभ्यं नमस्त्रिभुवनार्तिहराय नाथ, तुभ्यं नमः क्षितितलामलभूषणाय । तुभ्यं नमस्त्रिजगतः परमेश्वराय, तुभ्यं नमो जिनभवोदधि शोषणाय ॥ १ ॥ श्री १०८ महाराज श्री सोहनविजयजी चिरायु रहें, जो कि मनुष्यों की पापराशि को नष्ट करने वाले हैं जैसे सूर्य अंधकार--समूह को नाश करता है । जिस समय समस्त संप्रदाय समुदाय अपने अंतःकरण की मलिनता, अकाल मृत्यु, अन्न के अभाव तथा अन्याय से पीड़ित था उस समय आपने अपने चरणकमलों से इस प्रांतको भी पवित्र किया । आपका यहां आना उसी प्रकार आल्हादजनक है जिस प्रकार निशा के अवसान पर कमल-बंधु सूर्य भगवान् का उदय होता है । आपने प्रतिदिन अपने वचनामृतों से जनता में धर्म प्रचार किया जिसका प्रभाव यह हुआ कि बहुत Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034725
Book TitleAdorshopadhyay arthat Sohanvijayji Maharaj ka Jivan Vruttant
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHansraj Pt
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1936
Total Pages254
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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