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________________ (१२४) यहांपर शपथखाने के लिये भी कोई घर नहीं। प्राचीन भेरा यहांसे भी चार-पाँच कोस पर है और वह बिलकुल नष्टप्राय हो चुका है। नयेको बसे हुए भी अनुमान ८-९ सौ वर्ष हो चुके हैं, ऐसा वहांके लोगोंका कथन है । इस तीर्थकी यात्रा बड़े ही आनन्दसे हुई। ___ यहांपर सैंकड़ों स्त्री पुरुष दिनभर आपके दर्शनों के लिये आते रहे । पिण्डदादनखां और भेराके लोग बड़े ही सरल प्रकृतिके देखने में आये । कईएक तो आपको भिक्षाके लिये प्रार्थना करके अपने घर ले जाते और कईएक वहां मकानपर ही भोजन ले कर आजाते । जब उनको जैन साधुओंका आचार समझाया जाता तब वे आश्चर्य के साथ ही साथ प्रसन्नता प्रगट करते, परन्तु लाया हुआ भोजन वापिस ले जाते हुए हृदयमें कुछ कष्ट भी मानते थे । __ लोगोंके विशेष आग्रहसे आप दो रोज़ यहांपर ठहरे। यहां के लोगोंने आपका उपदेश खूब मन लगाकर सुना । व्याख्यानमें करीबन हज़ार-डेढ हज़ार लोग उपस्थित होजातेथे । फिर गुजरांवालामें पधारे ॥ यहांसे विहार करके पिंडदादनखां होते हुए आप रामनगरमें पधारे । ला. लद्धेशाह और ला. कुलयशरायकी अभ्यर्थनासे आपने एक सार्वजनिक व्याख्यान दिया। यहांपर कुल Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034725
Book TitleAdorshopadhyay arthat Sohanvijayji Maharaj ka Jivan Vruttant
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHansraj Pt
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1936
Total Pages254
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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