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________________ ( १०६ ) आपने जगद्गुरु हीरविजयसूरि के जीवनचरित को बड़ी ही सुन्दरता से वर्णन किया । आपके उपदेश से यहांके हिन्दू और मुसलमानों में भी कई एक सुधार हुए । __पंडित कृष्णलालजी शर्मा, पंडित नानकचंदजी, लाला मूलामल, लाला वेलीराम और लाला महेरचंदजी आदि तथा मीयां अबदुल अजीज, मीयां नत्थूदीन, मीयां लालखां, मीयां मुहम्मददीन, मीयां फजलदीन ( कसाई ) और मेहरदीन आदि कईएक सज्जन आपके खास भक्त बन गये । सनखतरेमें जैनोंके ११ घर हैं, एक विशाल जिनमन्दिर है; जिसे देखनेके लिये अनेक लोग आते रहते हैं । इस प्रकार आपका सं० १९७९ का चतुर्मास सनखतरेमें समाप्त हुआ। ॥ सनखतरे से जम्मूकी तर्फको॥ " जननी जन्मभूमिश्च स्वार्गादपि गरीयसी" कार्तिक शुक्ला १५ को यहांसे विहार करके ग्रामके बाहर आप एक सरकारी स्कूलमें ठहरे । प्रतिपदाके दिन यहांपर बड़ा भारी मेला होता है । अनुमान २०-२५ हज़ार आदमी *नोटः-स्वर्गीय गुरुदेव श्रीमद्विजयानंदसूरि (आत्माराम ) जी महाराज के पवित्र करकमलों से इस मंदिरकी अंतिम प्रतिष्टा सं० १९५३ वैशाख सुदि पूर्णिमा के दिन २७५ जिन प्रतिमाकी अंजनशलाका के साथ हुई है। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034725
Book TitleAdorshopadhyay arthat Sohanvijayji Maharaj ka Jivan Vruttant
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHansraj Pt
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1936
Total Pages254
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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