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________________ ( १०५ ) यदि कबरस्थान कहा जाय तो इसमें कोई बुराई तो नहीं है' । तात्पर्य, आपके इस युक्तियुक्त और सारगर्भित उपदेश का पीरसाहेब के हृदयपर बड़ा असर हुआ । पीर साहेबने कहा " आपका फर्माना बिलकुल सच है; मैं आजसे आपके सामने यह प्रतिज्ञा करता हूं कि आप की इस नसीहत का मैं ज़रूर पालन करूंगा, क्योंकि सोने का गढ़ छोड़ कर धसूं न कांटों बीच, हीरामोती फेंक कर लऊं न माटी कीच ।। अतः त्याज्य वस्तुओं का अवश्यमेव त्याग करूंगा। आपके चातुर्माससे सनखतरेकी जनताको बहुत लाभ मिला; अनेकोंने मदिराका त्याग किया, बहुतोंने मांस भक्षण छोड़ा, अधिक लोगोंने स्वदेशी वस्त्र पहनने का व्रत ग्रहण किया; उन लोगोंके दिलोंमें यह ठस गया कि दयारहित धर्म धर्म नहीं है। भादों सुदी एकादशी को जगद्गुरु श्री हीरविजयसूरिकी जयन्ती मनाई गई। इस उत्सवमें सभापतिके स्थानको आपने अलंकृत किया । यद्यपि मुसलमान भाइयोंकी उस दिन कत्लकी राते' थी, तथापि बहुतसे सजनोंने उत्सवमें भागलिया । १ मुहर्रम के दिनोंमें ९ वें दिन कत्ल की रात होती है और १० वें दिन ताज़िये निकलते हैं । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034725
Book TitleAdorshopadhyay arthat Sohanvijayji Maharaj ka Jivan Vruttant
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHansraj Pt
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1936
Total Pages254
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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