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________________ (१००) ॥ लाला हरिचन्दजीकी उदारता ।। " अयं निजः परो वेति, गणना लघुचेतसाम् । उदारचरितानां तु, वसुधैव कुटुम्बकम् ॥" तुच्छ हृदयवालोंके लिए ही तेरा मेरा " अपना और पराया," होता है, परंतु उदार चित्तवालोंको तो सारा संसार ही कुटुंब होता है। आपके प्रवेशके दिन लाला हरिचन्दजी लछमणदासजी, अमृतसरवाले भी आ गये। आपने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार भगवद्भक्ति, प्रभावना और साधर्मिवात्सल्य बड़े उत्साह और प्रेमसे किया। साधर्मिवात्सल्यमें अपने जातिभाइयोंके अलावा वहांके अधिकांश हिन्दू तथा मुसलमान भाइयोंको भी प्रीतिभोजन कराया, तथा सारे नगरमें ५-५ लड्डु प्रति घर दिये । नगरभरमें कोई भी घर न छोड़ा । चूढ़े चमार सभीके घरमें लड्डू पहुंचाये । एवं नगरके सभी देवस्थानोंमें प्रतिस्थान १ रुपया दिया । इस शुभ अवसरपर स्यालकोट के भी २०-२५ स्थानकवासी भाई आये हुए थे। उन्होंने भी तनमनसे इस शुभ कार्य में भाग लिया; तथा आपको स्यालकोट पधारनेकी अभ्यर्थना की। - 卐 -- Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034725
Book TitleAdorshopadhyay arthat Sohanvijayji Maharaj ka Jivan Vruttant
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHansraj Pt
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1936
Total Pages254
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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