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________________ ज्ञान पंचमीका उद्यापन बड़े उत्साहसे किया । इस अवसरपर नारोवाल, गुजरांवाला और स्यालकोट आदि शहरोंके सैंकड़ों श्रावक आये । चांदीकी पालकी और रथयात्राका सामान गुजरांवालासे लाया गया था। रथयात्राकी सवारी बड़ी धूमधामसे निकाली गई । भिन्न २ भजनमंडलियोंके समयानुकूल सुंदर भजनोंने जनताके मनको बड़ाही आनन्दित किया | रथयात्राकी सवारी के वक्त बाजार में आपका देवगुरु और धर्मके शुद्ध स्वरूप पर एक बड़ा ही प्रभावशाली उपदेश हुआ । व्याख्यानके समय लोगोंका खूब ही जमघट था ।। गुरुपादुकाकी स्थापना । दया धर्मका मूल है, पाप मूल अभिमान । तुलसी दया न छोडिये, जब लग घट में प्राण ॥ १॥ वैशाख शुक्ला पूर्णिमाके रोज मन्दिरमें स्वर्गीय परमगुरु देव न्यायाम्भोनिधि जैनाचार्य श्री १००८ श्रीमद्विजयानन्द सूरि उर्फ आत्मारामजी महाराजकी, चरणपादुकाकी स्थापनाकी गई । स्थापन करनेका श्रेय लाला अमीचन्दजी जैन ( खंडेलवाल ) प्रैजिडेंट म्युनिस्पाल कमेटी, को मिला । आपके उपदेशोंकी धूम सनखतराके चारों Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034725
Book TitleAdorshopadhyay arthat Sohanvijayji Maharaj ka Jivan Vruttant
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHansraj Pt
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1936
Total Pages254
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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