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________________ ( ९१ ) सनखतरेमें धर्म प्रचारकी धूम । गुरुदेवको सविधि वन्दन करके आपने होशयारपुरसे प्रस्थान किया, और उडमुडां (मुड़) में पधारे। यहांपर आपके दो उपदेश हुए, श्रोतागण सैंकड़ों की संख्यामें जमा होते रहे । उडमुड़ामें ४ घर जैनोंके हैं और एक मन्दिर है। यहांसे आप टांडा आये। यहांपर अनुमान ४० घर स्थानकवासी जैनोंके हैं । यहांपर भी आपका एक सार्वजनिक उपदेश हुआ। यहांसे विहार करके आप मियाणी पधारे । आपका प्रवेश बाजे के साथ बड़े उत्साहसे कराया गया । यहांपर आपके ३ व्याख्यान हुए, उनमें यहांकी तमाम जनताने भाग लिया । श्रोतागणोंपर आपके उपदेशका बड़ा अचल प्रभावपड़ा । अनेक लोगोंने विदेशी खांडका परित्याग किया। यहांसे चल कर आप सनखतरेमें पधारे । आपका प्रवेश बड़ी धूमधामसे कराया गया। प्रवेशमें जैनोंके सिवाय वहांके हिन्दू मुसलमान भी काफी संख्यामें उपस्थित थे । यहींपर श्री महावीर प्रभुके जन्मदिनका महोत्सव बड़े अच्छे ठाठसे मनाया गया । वीरप्रभुकी जयन्ती के दिन आपके उपदेशने सचमुचही एक जादूका काम किया। यहांके हिन्दू और मुसलमानों में इस समय अपूर्व उत्साह देखा गया, और उनको आपके उपदेशका खूब ही रंग चढ़ा । लाला गुरुदित्तामल दुग्गड़ की धर्मपत्नी धनदेवीने Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034725
Book TitleAdorshopadhyay arthat Sohanvijayji Maharaj ka Jivan Vruttant
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHansraj Pt
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1936
Total Pages254
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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