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________________ (८८) लाला भोलेशाहके पास पन्नेकी श्री स्तम्भन पार्श्वनाथकी जो मूर्ति है, उसके दर्शन किये । अनजान लोगोंकी पूछताछ । रामनगर और खानगाह डोगरांके दरम्यान हाफ़िज़ाबाद नामका एक ग्राम है । यहांपर जैन गृहस्थका सिर्फ एक ही घर है । इधर जैन साधुओं का आना-जाना बहुत ही कम होने से लोग उनके आचार विचार से बिलकुल अनभिज्ञ हैं । आप जब इस ग्राममें आये, तो लोग आपको देख कर चकित से हो गये । बहुतसे लोग आपको इस प्रकार पूछने लगे--आप किस देशके हैं ? आपका आना कहांसे हुआ ? आप यहां पर कैसे आये ? तथा साधुओंके हाथमें तर्पणी (लालरंगका काष्टपात्र ) देख कर लोग और भी हैरान से होकर पूछते थे कि ये वर्तन-भांडे कहांसे लाये हो ? ये कहांसे आते हैं ? इत्यादि । आपने उनको बड़े धैर्यसे जैन साधुओंके नियमों तथा आचार विचार आदिके विषयमें सब कुछ समझाया, जिससे प्रश्नकर्ताओं पर खूब प्रभाव पड़ा । जैसे कहा भी है:-- तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजे चहुँ ओर । वशीकरण इक मंत्र है तज दे बचन कठोर ॥ यहां पर बाज़ारमें आपके दो व्याख्यान हुए । व्या Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034725
Book TitleAdorshopadhyay arthat Sohanvijayji Maharaj ka Jivan Vruttant
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHansraj Pt
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1936
Total Pages254
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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