SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 113
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ( ८४ ) ॥ विरोधकी शांति ॥ विषपूर्ण इर्षा द्वेष पहले शीघ्रतासे छोडदो । घर फंकने वाली फूटेली फूटका सिर फोडदो ॥ मालिन्यसे मुंह मोडकर मद मोहके पद तोडदो । टूटे हुए वे प्रेम बंधन फिर परस्पर जोडदो ॥१॥ यहांपर इतना बतला देना अनुचित न होगा कि जंडियाले में आपके सदुपदेशसे जो लाभ हुआ, वह आपके जीवनके इतिहासमें एक खास स्थान रखता है । लगभग डेढ़ दो सौ वर्षोंसे पट्टी और जंडियालेके जैनबन्धुओंमें देववशात् एक ऐसा विरोध पड़ गया था, कि आपसमें व्यवहार तक बन्द हो चुका था; परन्तु आपके सदुपदेशसे इनका आपसमें मिलाप हो गया। सैंकड़ों वर्षोंका वैमनस्य जाता रहा, एक दूसरेका अब खुले दिलसे मिलाप होने लगा । क्योंकि गुणिजनोंका संग असंभवको भी संभव करके दिखा देता है, जैसे नीतिकारोंने कहा भी है:" हरति कुमति भिंते मोहं करोति विवेकतां, वितरति रतिं सूते नीति तनोति विनीतताम् । प्रथयति यशो धत्ते धर्म व्यपोहति दुर्गतिं, जनयति नृणां किं नाभीष्टं गुणोत्तमसंगमः ॥" यहांसे विहार करके आप अमृतसर पधारे । अमृतसर के श्री संघने भी आपका बड़ी धूमधामसे प्रवेश कराया । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034725
Book TitleAdorshopadhyay arthat Sohanvijayji Maharaj ka Jivan Vruttant
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHansraj Pt
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1936
Total Pages254
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy