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________________ (७१) भिन्नासर पधारे । यहां दो दिन तक पूजा प्रभावना साधा. र्मिक वात्सल्य का खूब आनंद रहा। * भिन्नासर बीकानेरसे २-३ मीलके फासले पर है। दोनों रोज यहां पर दर्शनाभिलाषी श्रावक-श्राविका वर्ग की खूब भीड़ रही। ज्येष्ठ शुक्ला सप्तमीको बीकानेर में बड़ी-धूम-धामसे आपका प्रवेश हुआ । उपाश्रयमें पधारने पर आपने एक बड़ाही उपयोगी धर्मोपदेश दिया। सुराणाजीकी तरफसे श्रीफलकी प्रभावना की गई। सूरिजयन्ती का समारोह अवद्यमुक्ते पथि यः प्रवर्तते, प्रवर्तयत्यन्यजनं च निस्पृहः । स एव सेव्यः स्वहितैषिणा गुरुः स्वयं तरंस्तारयितुं क्षमः परम्।। भा०-अवद्य मुक्तिके पथ में खुद चलते हैं, और दूसरों को चलाते हैं । निस्पृही, तरण तारण, ऐसे गुरुमहाराज ही आत्म हितेच्छुओं को सेव्य हैं। ज्येष्ठ शुक्ला अष्टमी के रोज़ स्वर्गीय आचार्यश्री १००८ विजयानन्दसूरि महाराज का जयन्ती महोत्सव बड़ी धूमधामसे मनाया गया । प्रमुखस्थानको आपने ही सुशोभित किया । मुनि समुद्रविजयजी तथा पण्डित जयदयालजी, और पंडित हंसराजजी शास्त्रीके ओजस्वी * पहले दिन श्रीयुत सुराणाजी साहबकी तरफसे और दूसरे दिन कोचरों की तरफ से यह कार्य हुए थे। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034725
Book TitleAdorshopadhyay arthat Sohanvijayji Maharaj ka Jivan Vruttant
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHansraj Pt
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1936
Total Pages254
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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