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________________ ५२ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ गये थे, पर न तो वे राजसभा में गये थे न चैत्यवासियों के साथ उनका शास्त्रार्थ हुआ और न राजा दुर्लभ ने उनको खरतर बिरुद ही दिया था, केवल पुरोहित राजसभा में गया था। समझ में नहीं आता है कि खरतर झूठ मूट ही जिनेश्वरसूरि को खरतर कैसे बना रहे हैं? इसी प्रकार आचार्य प्रभाचंद्रसूरि रचित प्रभाविक चरित्र का प्रमाण हम पूर्व उद्धृत कर आये हैं। ये दोनों प्रमाण प्राचीन याने चौदहवीं शताब्दी के हैं, इसके पूर्व का कोई भी प्रमाण नहीं मिलता है कि जिनेश्वरसूरि को खरतर बिरुद तो क्या पर जिससे राजसभा में जाना या शास्त्रार्थ होना सिद्ध होता हो। जिनेश्वरसूरि के पाटण जाने का समय आधुनिक खरतरों ने वि. सं. १०८० लिखा है वह भी गलत है, जिसको मैं पहले भाग में लिख आया हूँ कि वि. सं. १०८० में पाटण का राजा दुर्लभ नहीं पर भीम था। राजा दुर्लभ का राज तो वि. सं. १०७८ तक ही रहा था। अतः खरतरों का यह लिखना गलत है कि वि. सं. १०८० में जिनेश्वरसूरि को खरतर बिरुद मिला था। एक सवाल यह उपस्थित होता है कि चैत्यवासी लोग सुविहितों को नगर में क्यों नहीं ठहरने देते थे? शायद चैत्यवासियों को यह भय होगा कि यह चैत्यवासियों से निकल कर नामधारी सुविहित जैनसंघ के संगठन बल के टुकड़े टुकड़े करके संघ में फूट कुसम्प के बीज न बो डालें और आखिर उन्हीं की धारणा सोलह आने सत्य ही निकली। कारण, पाटण में जिनेश्वरसूरि को ठहरने के लिए स्थान मिला और उन्होंने चैत्यवास और वसतिवास का भेद डाल संघ में फूट के बीज बो ही दिये, फिर तो ग्राम ग्राम में वसतिवासियों के लिये नये नये मकान बनने शुरु हो गये, जैसे ढूँढ़ियों के लिये ग्राम ग्राम में स्थानक बनवाने का प्रचार हुआ था। मनुष्य अभिमान के गज पर सवार हो जाता है तब वह हिताहित का भान तक भूल जाता है। यही हाल नामधारी सुविहितों का हुआ है। जिनेश्वरसूरि चैत्यवासियों के शिथिल आचार की पुकार करने को पाटण गये पर वहां आपने स्वयं अपने लिए बनाये हुये मकान में चातुर्मास कर वज्रक्रिया रुप पाप की गठरी शिर पर उठाई। कारण, साधु के लिये बनाये हुये मकान में साधु को पैर रखना भी नहीं कल्पता है। यदि साधु के लिये बनाया हुआ मकान में साधु ठहरे तो आचारांगसूत्र में सावध एव वज्रक्रिया, दशवैकालिक में आचार से भ्रष्ट तथा निशीथसूत्र में दंड बतलाया है। यह कार्य चैत्यवास का रुपान्तर नहीं तो और क्या है? खैर यह तो हुई जिनेश्वरसूरि के पाटण जाने की बात जिसका सारांश यह है
SR No.034715
Book TitleKhartar Gaccha Ka Itihas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar Maharaj
PublisherRatnaprabhakar Gyan Pushpmala
Publication Year
Total Pages256
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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