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________________ १५० ~~~~~~~~~~immamaar ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ लिखा है कि अभयदेवसूरि एवं हम चन्द्रकुल में हैं। ५. वर्धमानसूरि के पट्टधर पद्मप्रभसूरि हुये उन्होंने मुनिसुव्रत चरित्र लिखा है। उसमें अभयदेवसूरि को खरतर नहीं पर चन्द्र कुल के ही बतलाया है। ६. अभयदेवसूरि की सन्तान में एक धर्मघोषसूरि हुये। उन्होंने आबू के मन्दिर की प्रतिष्ठा करवाई, जिसके शिलालेख में भी अपने को अभयदेवसूरि की सन्तान लिखा है पर खरतर की गंध भी नहीं है। अतः इससे पाया जाता है कि अभयदेवसूरि तो क्या पर उनके बाद आपकी सन्तान में भी कोई खरतर पैदा नहीं हुआ था अर्थात् अभयदेवसूरि की परम्परा शुद्ध चन्द्रकुल में है और खरतरों के साथ उनका कोई सम्बन्ध नहीं है अर्थात् वे खरतरों से अलग है कारण अभयदेवसूरि की परम्परा तो शुद्ध चान्द्रकुल की परम्परा है और खरतरों की परम्परा कुर्चपुरागच्छ की परम्परा है क्योंकि खरतर परम्परा चलाने वाला मूलपुरुष जिनवल्लभ था और वह था कुर्चपुरागच्छ का उनकी परम्परा ही खरतर कहलाती है। ७. अभयदेवसूरि अपनी मौजूदगी में अपने पट्ट पर वर्धमानसूरि को स्थापित कर गये थे और उन वर्धमानसूरि की परम्परा अभयदेवसूरि के नाम से चली आई है। अतः अभयदेवसूरि के साथ जिनवल्लभ एवं खरतरों का कुछ भी सम्बन्ध नहीं ८. अभयदेवसूरि का स्वर्गवास वि. सं. ११३५ में हुआ, तब जिनवल्लभ ने सं. ११६४ में उत्सूत्र भाषण कर वीर के ६ कल्याणक की प्ररुपणा की, जिसका सुविहित और चैत्यवासियों ने खूब विरोध करके जिनवल्लभ को संघ बाहर कर दिया था। इतना होने पर भी जिनवल्लभ वि. सं. ११६७ में आचार्य अभयदेवसूरि का पट्टधर बन गया। क्या ऐसा उत्सूत्र प्ररुपक जिनवल्लभ अभयदेवसूरि का पट्टधर बन सकता है? कभी नहीं. ९. श्रीयुत अगरचंदजी भंवरलालजी नाहटा बीकानेर वालों ने 'युगप्रधान जिनचन्द्रसूरि' नाम की किताब लिखी है जिसमें आपने गच्छ राग से रंजित हो अभयदेवसूरि को खरतर साबित करने के लिये विक्रम की सत्रहवीं शताब्दी के कई गच्छों के आचार्यों के हस्ताक्षर मुद्रित करवाये हैं। पर उन हस्ताक्षरों के साथ १. देखो खरतर गच्छोत्पत्ति भाग दूसरा । २. देखो खरतर गच्छोत्पत्ति भाग दूसरा । ३. देखो खरतर गच्छोत्पत्ति भाग दूसरा । ४. देखो गणधर सार्द्धशतक नामक ग्रन्थ । ५. असंविग्नसमुदायेन संविग्नसमुदायः संघ बहिष्कृतः । प्रवचन परिक्षा, पृष्ठ २४२
SR No.034715
Book TitleKhartar Gaccha Ka Itihas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar Maharaj
PublisherRatnaprabhakar Gyan Pushpmala
Publication Year
Total Pages256
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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