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________________ आगम सूत्र ३४, छेदसूत्र-१, निशीथ' उद्देशक/सूत्र उद्देशक-१४ "निसीह'' सूत्र के इस उद्देशक में ८६३ से ९०४ यानि कि कुल ४१ सूत्र हैं । उसमें कहे अनुसार किसी भी दोष का त्रिविधे सेवन करनेवाले को चाउम्मासियं परिहारट्ठाणं उग्घातियं' नाम का प्रायश्चित्त आता है। सूत्र-८६३-८६६ जो साधु-साध्वी नीचे कहने के अनुसार पात्र खुद ग्रहण करे, दूसरों के पास ग्रहण करवाए या उस तरह से ग्रहण करनेवाले की अनुमोदना करे तो प्रायश्चित्त । खुद खरीद करे, करवाए या कोई खरीदकर लाए तो ले, उधार ले, दिलवाए, सामने से उधार दिया हुआ ग्रहण करे, पात्र एक दूजे से बदले, बदलाए, कोई बदला हुआ लाए तो रखे, छीनकर लाए, अनेक मालिक हो वैसा पात्र सबकी आज्ञा बिना ले, सामने से लाया गया पात्र स्वीकार करे । सूत्र-८६७-८६९ जो साधु-साध्वी अधिक पात्र हो तो सामान्य से या विशेष से गणि को पूछे बिना या निमंत्रित किए बिना अपनी ईच्छा अनुसार दूसरों को वितरण करे, हाथ, पाँव, कान, नाक, होठ जिसके छेदन न हुए हो ऐसे विकलांग ऐसे क्षुल्लक आदि या कमजोर को न दे, न दिलाए या न देनेवाले की अनुमोदना करे। सूत्र-८७०-८७१ जो साधु-साध्वी खंड़ित, निर्बल, लम्बे अरसे तक न टिके ऐसे, न रखने के योग्य पात्र धारण करे, अखंड़ित, दृढ़, टिकाऊ और रखने में योग्य पात्र धारण न करे, न करवाए, न करनेवाले की अनुमोदना करे तो प्रायश्चित्त । सूत्र-८७२-८७३ जो साधु-साध्वी शोभायमान या सुन्दर पात्र को अशोभनीय करे और अशोभन पात्र को शोभायमान या सुन्दर करे-करवाए या करनेवाले की अनुमोदना करे तो प्रायश्चित्त । सूत्र - ८७४-८८१ जो साधु-साध्वी मुझे नया पात्र नहीं मिलता ऐसा करके मिले हुए पात्र को या मेरा पात्र बदबूवाला है ऐसा करके-सोचकर अचित्त ऐसे ठंड़े या गर्म पानी से एक या ज्यादा बार धोए, काफी दिन तक पानी में डूबोकर रखे, कल्क, लोध्र, चूर्ण, वर्ण आदि उद्वर्तन चूर्ण का लेप करे या काफी दिन तक लेपवाला करे, करवाए या अनुमोदना करे तो प्रायश्चित्त । सूत्र-८८२-८९३ जो साधु-साध्वी सचित्त पृथ्वी पर पात्र को एक या बार बार तपाए या सुखाए, वहाँ से आरम्भ करके जो साधु-साध्वी ठीक तरह से न बाँधे हुए, ठीक न किए हुए, अस्थिर या चलायमान ऐसे लकड़े के स्कन्ध, मंच, खटिया के आकार का मांची, मंडप, मजला, जीर्ण ऐसा छोटा या बड़ा मकान उस पर पात्रा तपाए या सूखाए, दूसरों को सूखाने के लिए कहे उस तरह से सूखानेवाले की अनुमोदना करे तो प्रायश्चित्त । इस ८८२ से ८९३ यह ११ सूत्र उद्देशक-१३ के सूत्र ७८९ से ७९९ अनुसार हैं । इसलिए इस ११ सूत्रों का विस्तार उद्देशक-१३ के सूत्र अनुसार जान ले - समझ लेना । फर्क इतना की यहाँ उस जगह पर पात्र तपाए ऐसा समझना। सूत्र-८९४-८९८ जो साधु-साध्वी पात्र में पड़े सचित्त पृथ्वी, अप् या तेऊकाय को, कंद, मूल, पात्र, फल, पुष्प या बीज को खुद बाहर नीकाले, दूसरों से नीकलवाए, कोई नीकालकर सामने से दे उसका स्वीकार करे, करवाए, करनेवाले की अनुमोदना करे तो प्रायश्चित्त । मुनि दीपरत्नसागर कृत् “(निशीथ)” आगम सूत्र-हिन्दी अनुवाद” Page 36
SR No.034702
Book TitleAgam 34 Nishith Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages51
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 34, & agam_nishith
File Size2 MB
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