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________________ आगम सूत्र २६, पयन्नासूत्र-३, 'महाप्रत्याख्यान' सूत्रसूत्र-१२५ उस दुःख के विपाक द्वारा वहाँ वहाँ वेदना पाते हुए फिर भी अचिंत्य जीव कभी पहेले अजीव नहीं हुआ है सूत्र - १२६ अप्रतिबद्ध विहार, विद्वान मनुष्य द्वारा प्रशंसा प्राप्त और महापुरुष ने सेवन किया हआ वैसा जिनभाषित जान कर अप्रतिबद्ध मरण अंगीकार कर ले। सूत्र-१२७ जैसे अंतिम काल में अंतिम तीर्थंकर भगवान ने उदार उपदेश दिया वैसे मैं निश्चय मार्गवाला अप्रतिबद्ध मरण अंगीकार करता हूँ। सूत्र-१२८-१३० बत्तीस भेद से योग संग्रह के बल द्वारा संयम व्यापार स्थिर कर के और बारह भेद से तप समान स्नेहपान करके- संसार रूपी रंग भूमिका में धीरज समान बल और उद्यम समान बख्तर को पहनकर सज्ज हुआ तू मोह समान मल का वध कर के आराधना समान जय पताका का हरण कर ले (प्राप्त कर) | और फिर संथारा में रहे साधु पुराने कर्म का क्षय करते हैं। नए कर्म को नहीं बाँधते कर्म व्याकुलता समान वेलड़ी का छेदन करते हैं। सूत्र-१३१ आराधना के लिए सावधान ऐसा सुविहित साधु सम्यक् प्रकार से काल करके उत्कृष्ट तीन भव का अतिक्रमण करके निर्वाण को (मोक्ष) प्राप्त करे। सूत्र-१३२ उत्तम पुरुष ने कहा हुआ, सत्पुरुष ने सेवन किया हआ, बहोत कठीन अनशन कर के निर्विघ्नरूप से जय पताका प्राप्त करे। सूत्र-१३३ हे धीर ! जिस तरह वो देश काल के लिए सुभट जयपताका का हरण करता है उसी तरह से सूत्रार्थ का अनुसरण करते हुए और संतोष रूपी निश्चल सन्नाह पहनकर सज्ज होनेवाला तुम जयपताका को हर ले । सूत्र-१३४ चार कषाय, तीन गारव, पाँच इन्द्रिय का समूह और परिसह समान फौज का वध कर के आराधना समान जय पताका को हर ले। सूत्र-१३५ हे आत्मा ! यदि तू अपार संसार समान महोदधि के पार होने की ईच्छा को रखता हो तो मैं दीर्घकाल तक जिन्दा रहूँ या शीघ्र मर जाऊं ऐसा निश्चय करके कुछ भी मत सोचना । सूत्र - १३६ यदि सर्व पापकर्म को वाकई में निस्तार के लिए ईच्छता है तो जिनवचन, ज्ञान, दर्शन, चारित्र और भाव के लिए उद्यमवंत होने के लिए जागृत हो जा। सूत्र - १३७ दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप ऐसे आराधना चार भेद से होती है, और फिर वो आराधना उत्कृष्ट, मध्यम, जघन्य ऐसे तीन भेद से होती है। मुनि दीपरत्नसागर कृत् “(महाप्रत्याख्यान)” आगमसूत्र-हिन्दी अनुवाद” Page 14
SR No.034693
Book TitleAgam 26 Mahapratyakhyan Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages16
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 26, & agam_mahapratyakhyan
File Size2 MB
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