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________________ आगम सूत्र ७, अंगसूत्र-७, 'उपासकदशा' अध्ययन/ सूत्रांक सूत्र-६ तत्पश्चात् श्रमण भगवान महावीर ने आनन्द गाथापति तथा महती परीषद् को धर्मोपदेश किया । पर्षदा वापस लौटी और राजा भी नीकला । सूत्र -७ तब आनन्द गाथापति श्रमण भगवान महावीर से धर्म का श्रवण कर हर्षित व परितुष्ट होता हुआ यों बोला-भगवन् ! मुझे निर्ग्रन्थ प्रवचन में श्रद्धा है, विश्वास है । निर्ग्रन्थ-प्रवचन मुझे रुचिकर है । वह ऐसा ही है, तथ्य है, सत्य है, इच्छित है, प्रतीच्छित है, इच्छित-प्रतिच्छित है । यह वैसा ही है, जैसा आपने कहा । देवानुप्रिय ! जिस प्रकार आपके पास अनेक राजा, ऐश्वर्यशाली, तलवर, माडंबिक, कौटुम्बिक, श्रेष्ठी, सेनापति एवं सार्थवाह आदि मुण्डित होकर, गह-वास का परित्याग कर अनगार के रूप में प्रवजित हए, मैं उस प्रकार मुण्डित होकर प्रवजित होने में असमर्थ हूँ, इसलिए आपके पास पाँच अणुव्रत, सात शिक्षाव्रत मूलक बारह प्रकार का गृहधर्म-ग्रहण करना चाहता हूँ। भगवान ने कहा-देवानुप्रिय ! जिससे तुमको सुख हो, वैसा ही करो, पर विलम्ब मत करो। सूत्र-८ तब आनन्द गाथापति ने श्रमण भगवान महावीर के पास प्रथम स्थूल प्राणातिपात-परित्याग किया । मैं जीवन पर्यन्त दो करण-करना, कराना तथा तीन योग-मन, वचन एवं काया से स्थूल हिंसा का परित्याग करता हूँ, तदनन्तर उसने स्थूल मृषावाद-का परित्याग किया, मैं जीवन भर के लिए दो कारण और तीन योग से स्थूल मृषावाद का परित्याग किया, मैं जीवनभर के लिए दो कारण और तीन योग से स्थूल मृषावाद का परित्याग करता हूँ। उसके बाद उसने स्थूल अदत्तादान का परित्याग किया । मैं जीवनभर के लिए दो करण और तीन योग से स्थूल चोरी का परित्याग करता हूँ। फिर उसने स्वदारसंतोष व्रत के अन्तर्गत मैथुन का परिमाण किया । अपनी एकमात्र पत्नी शिवनंदा के अतिरिक्त अवशेष समग्र मैथुनविधि का परित्याग करता हूँ। तब उसने-परिग्रह का परिमाण करते हुए-निधान चार करोड़ स्वर्ण-मुद्राओं, व्यापार-प्रयुक्त चार करोड़ स्वर्णमुद्राओं तथा घर व घर के उपकरणों में प्रयुक्त चार करोड़ स्वर्ण-मुद्राओं के अतिरिक्त मैं समस्त स्वर्ण-मुद्राओं का परित्याग करता हूँ। फिर उसने चतुष्पद-विधि परिमाण किया । दस-दस हजार के चार गोकुलों के अतिरिक्त मैं बाकी सभी चौपाए पशुओं के परिग्रह का परित्याग करता हूँ। फिर उसने क्षेत्र-वास्तु-विधि का परिमाण किया-सौ निवर्तन के एक हल के हिसाब से पाँच सौ हलों के अतिरिक्त मैं समस्त क्षेत्र का परित्याग करता हूँ । तत्पश्चात् उसने शकटविधि का परिमाण किया । पाँच सौ गाडियाँ बाहर यात्रा में तथा पाँच सौ गाडियाँ माल ढोने आदि में प्रयुक्त-के सिवाय मैं सब गाड़ियों के परिग्रह का परित्याग करता हूँ। फिर उसने वाहनविधि-का परिमाण किया । पाँच सौ वाहन दिग्-यात्रिक तथा पाँच सौ गृह-उपकरण के सन्दर्भ में प्रयुक्त के सिवाय मैं सब प्रकार के वाहन रूप परिग्रह का परित्याग करता हूँ। फिर उसने उपभोग-परिभोग-विधि का प्रत्याख्यान करते हुए भीगे हुए शरीर को पोंछने के तौलिए आदि परिमाण किया । मैं सुगन्धित और लाल-एक प्रकार के अंगोछे के अतिरिक्त सभी अंगोछे रूप परिग्रह का परित्याग करता हूँ। तत्पश्चात् उसने दतौन के संबंध में परिमाण किया – हरि मुलहठी के अतिरिक्त मैं सब प्रकार के दतौनों का परित्याग करता हूँ । तदनन्तर उसने फलविधि का परिमाण किया - मैं क्षीर आमलक के सिवाय शेष फलविधि का परित्याग करता हूँ। उसके बाद उसने अभ्यंगन-विधि का परिमाण किया - शतपाक तथा सहस्रपाक तैलों के अतिरिक्त और सभी मालिश के तैलों का परित्याग करता हूँ । इसके बाद उसने उबटन-विधि का परित्याग किया । एक मात्र सुगन्धित गंधाटक-अतिरिक्त अन्य सभी उबटनों का मैं परित्याग करता हूँ। उसके बाद उसने स्नान-विधि का परिमाण किया । पानी के आठ औष्ट्रिक-(घड़े) के अतिरिक्त स्नानार्थ जल का परित्याग करता हूँ । उसने वस्त्रविधि का परिमाण किया-सूती दो वस्त्रों के सिवाय मैं अन्य वस्त्रों का परित्याग करता हूँ। उसने विलेपन विधि का परिमाण किया-अगर, कुंकुम तथा चन्दन के अतिरिक्त मैं सभी विलेपन-द्रव्यों मुनि दीपरत्नसागर कृत् " (उपासकदशा) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 6
SR No.034674
Book TitleAgam 07 Upasakdasha Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages33
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 07, & agam_upasakdasha
File Size2 MB
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