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________________ आगम सूत्र ६, अंगसूत्र-६, 'ज्ञाताधर्मकथा' श्रुतस्कन्ध/वर्ग/अध्ययन/ सूत्रांक परन्तु हे माता-पिता ! यह हिरण्य सुवर्ण यावत् स्वापतेय (द्रव्य) सब अग्निसाध्य है-इसे अग्नि भस्म कर सकती है, चोर चूरा सकता है, राजा अपहरण कर सकता है, हिस्सेदार बँटवारा कर सकते हैं और मृत्यु आने पर वह अपना नहीं रहता है । इसी प्रकार यह द्रव्य अग्नि के लिए समान है, अर्थात् जैसे द्रव्य उसके स्वामी का है, उसी प्रकार अग्नि का भी है और इसी तरह चोर, राजा, भागीदार और मृत्यु के लिए भी सामान्य है । यह सड़ने, पड़ने और विध्वस्त होने के स्वभाव वाला है । पश्चात् या पहले अवश्य त्याग करने योग्य है । हे माता-पिता ! किसे ज्ञात है कि पहले कौन जाएगा और पीछे कौन जाएगा? अत एव मैं यावत् दीक्षा अंगीकार करना चाहता हूँ। सूत्र-३३ मेघकुमार के माता-पिता जब मेघकुमार को विषयों के अनुकूल आख्यापना से, प्रज्ञापना से, संज्ञापना से, विज्ञापना से समझाने, बझाने, संबोधित करने और मनाने में समर्थ नहीं हए, तब विषयों के प्रतिकल तथा संयम के प्रति भय और उद्वेग उत्पन्न करने वाली प्रज्ञापना से कहने लगे-हे पुत्र ! यह निर्ग्रन्थ प्रवचन सत्य है, अनुत्तर है, सर्वज्ञकथित है, प्रतिपूर्ण है, नैयायिक है, शल्यकर्त्तन है, सिद्धि का मार्ग है, मुक्तिमार्ग है, निर्याण का मार्ग है, निर्वाण का मार्ग है और समस्त दुःखों का पूर्णरूपेण नष्ट करने का मार्ग है । जैसे सर्प अपने भक्ष्य को ग्रहण करने में निश्चल दृष्टि रखता है, उसी प्रकार इस प्रवचन में दृष्टि निश्चल रखनी पड़ती है । यह छूरे के समान एक धार वाला है, इस प्रवचन के अनुसार चलना लोहे के जौ चबाना है । यह रेत के कवल के समान स्वादहीन है । इसका पालन करना गंगा नामक महानदी के सामने पूर में तैरने के समान कठिन है, भुजाओं से महासमुद्र को पार करना है, तीखी तलवार पर आक्रमण करने के समान है, महाशिला जैसी भारी वस्तुओं को गले में बाँधने के समान है, तलवार की धार पर चलने के समान है। हे पुत्र ! निर्ग्रन्थ श्रमणों को आधाकर्मी औद्देशिक, क्रीतकृत स्थापित, रचित, दुर्भिक्षभक्त, कान्तारभक्त, वर्दलिका भक्त, ग्लान भक्त आदि दूषित आहार ग्रहण करना नहीं कल्पता है । इसी प्रकार मूल का भोजन, कंद का भोजन, फल का भोजन, शालि आदि बीजों का भोजन अथवा हरित का भोजन करना भी नहीं कल्पता है। इसके अतिरिक्त हे पुत्र ! तू सुख भोगने योग्य है, दुःख सहने योग्य नहीं है । तू सर्दी या गर्मी सहने में समर्थ नहीं है । भूख प्यास नहीं सह सकता, वात, पित्त, कफ और सन्निपात से होने वाले विविध रोगों को तथा आतंकों को, प्रतिकूल वचनों को, परीषहों को और उपसर्गों को सम्यक् प्रकार सहन नहीं कर सकता । अत एव हे लाल ! तू मनुष्य सम्बन्धी कामभोगों को भोग । बाद में भुक्तभोग होकर श्रमण भगवान महावीर के निकट प्रव्रज्या अंगीकार करना। तत्पश्चात् माता-पिता के इस प्रकार कहने पर मेघकुमार ने माता-पिता से इस प्रकार कहा-हे माता-पिता ! आप मुझे यह जो कहते हैं सो ठीक है कि-हे पुत्र ! यह निर्ग्रन्थ प्रवचन सत्य है, सर्वोत्तम है, आदि पूर्वोक्त कथन यहाँ दोहरा लेना चाहिए; यावत् बाद में भुक्तभोग होकर प्रव्रज्या अंगीकार कर लेना । परन्तु हे माता-पिता ! इस प्रकार यह निर्ग्रन्थ प्रवचन क्लीब-हीन संहनन वाले, कायर-चित्त की स्थिरता से रहित, कुत्सित, इस लोक सम्बन्धी विषयसुख की अभिलाषा करने वाले, परलोक के सुख की ईच्छा न करने वाले सामान्य जन के लिए ही दुष्कर है । धीर एवं दृढ़ संकल्प वाले पुरुष को इसका पालन करना कठिन नहीं है । इसका पालन करने में कठिनाई क्या है ? अत एव हे माता-पिता ! आपकी अनुमति पाकर मैं श्रमण भगवान महावीर के निकट प्रव्रज्या ग्रहण करना चाहता हूँ। जब माता-पिता मेघकुमार को विषयों के अनुकूल और विषयों में प्रतिकूल बहुत सी आख्यापना, प्रज्ञापना और विज्ञापना से समझाने, बुझाने, सम्बोधन करने और विज्ञप्ति करने में समर्थ न हुए, तब ईच्छा के बिना भी मेघ-कुमार से बोले-'हे पुत्र ! हम एक दिन भी तुम्हारी राज्यलक्ष्मी देखना चाहते हैं ।' तब मेघकुमार माता-पिता का अनुसरण करता हुआ मौन रह गया । तत्पश्चात् श्रेणिक राजा ने कौटुम्बिक पुरुषों-सेवकों को बुलवाया और ऐसा कहा-'देवानुप्रियो ! मेघकुमार का महान अर्थ वाले, बहुमूल्य एवं महान पुरुषों के योग्य विपुल राज्याभिषेक तैयार करो ।' कौटुम्बिक पुरुषों ने यावत् सब सामग्री तैयार की। तत्पश्चात् श्रेणिक राजा ने बहुत से गणनायकों एवं दंडनायकों आदि से परिवृत्त होकर मेघकुमार को, एक मुनि दीपरत्नसागर कृत् " (ज्ञाताधर्मकथा)- आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 24
SR No.034673
Book TitleAgam 06 Gnatadharm Katha Sutra Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages162
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 06, & agam_gyatadharmkatha
File Size4 MB
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