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आगम सूत्र ५, अंगसूत्र-५, 'भगवती/व्याख्याप्रज्ञप्ति-2'
शतक/वर्ग/उद्देशक/ सूत्रांक किन्तु बोलने का समय बीत जाने के बाद भी भाषा नहीं कहलाती । भगवन् ! (बोलने से पूर्व भाषा का भेदन होता है, या बोलते समय भाषा का भेदन होता है, अथवा बोलने का समय बीत जाने के बाद भाषा का भेदन होता है ? गौतम ! (बोलने से) पूर्व भाषा का भेदन नहीं होता, बोलते समय भाषा का भेदन होता है, किन्तु बोलने के बाद भेदन नहीं होता
भगवन् ! भाषा कितने प्रकार की है ? गौतम ! भाषा चार प्रकार की है। यथा-सत्य भाषा, असत्य भाषा, सत्यामृषा भाषा और असत्यामृषा (व्यवहार) भाषा । सूत्र- ५९०
भगवन् ! मन आत्मा है, अथवा आत्मा से भिन्न ? गौतम ! आत्मा मन नहीं है । मन अन्य है; इत्यादि । भाषा के (प्रश्नोत्तर) समान मन के विषय में भी यावत्-अजीवों के मन नहीं होता; (यहाँ तक) कहना । भगवन् ! (मनन से) पूर्व मन कहलाता है, या मनन के समय, अथवा मनन के बाद मन कहलाता है ? गौतम ! भाषा के अनुसार कहना । भगवन् ! (मनन से) पूर्व मन का भेदन होता है, अथवा मनन करते या मनन-समय व्यतीत हो जाने पर ? गौतम ! भाषा अनुसार कहना।
भगवन् ! मन कितने प्रकार का कहा गया है ? गौतम ! मन चार प्रकार का कहा गया है । यथा-सत्यमन, मृषामन, सत्यमृषा-(मिश्र) मन और असत्यामृषा (व्यवहार) मन । सूत्र-५९१
भगवन् ! काय आत्मा है, अथवा अन्य है ? गौतम ! काय आत्मा भी है और आत्मा से भिन्न भी है । भगवन् ! काय रूपी है अथवा अरूपी ? गौतम ! काय रूपी भी है और अरूपी भी है । इसी प्रकार काय सचित्त भी है और अचित्त भी है। इसी प्रकार एक-एक प्रश्न करना चाहिए । काय जीवरूप भी है और अजीवरूप भी है । काय जीवों के भी होता है, अजीवों के भी होता है।
भगवन् ! (जीव का सम्बन्ध होने से) पूर्व काया होती है, (अथवा कायिकपुद्गलों) के ग्रहण होते समय या काया-समय बीत जाने पर भी काया होती है ? गौतम ! पूर्व भी, चीयमान होते समय भी और काया-समय बीत जाने पर भी काया होती है । भगवन् ! (कायरूप से ग्रहण करने के समय से) पूर्व, ग्रहण करते या काया-समय बीत जाने पर काया का भेदन होता है ? गौतम ! (कायरूप से ग्रहण करने के समय से) पूर्व भी, पुद्गलों का ग्रहण होते समय भी और काय-समय बीत जाने पर भी काय का भेदन होता है।
भगवन् ! काय कितने प्रकार का कहा गया है ? गौतम ! सात प्रकार का औदारिक, औदारिकमिश्र, वैक्रिय, वैक्रियमिश्र, आहारक, आहारकमिश्र और कार्मण। सूत्र-५९२
भगवन् ! मरण कितने प्रकार का है ? गौतम ! पाँच प्रकार का आवीचिकमरण, अवधिमरण, आत्यन्तिकमरण, बालमरण और पण्डितमरण । भगवन् ! आवीचिकमरण कितने प्रकार का है ? गौतम ! पाँच प्रकार का । द्रव्यावीचिकमरण, क्षेत्रावीचिकमरण, कालावीचिकमरण, भवावीचिकमरण और भावावीचिकमरण | भगवन् ! द्रव्यावीचिकमरण कितने प्रकार का है ? गौतम ! वह चार प्रकार का है। नैरयिक-द्रव्यावीचिकमरण, तिर्यग्योनिक द्रव्यावीचिकमरण, मनुष्य-द्रव्यावीचिकमरण और देव-द्रव्यावीचिकमरण ।
भगवन् ! नैरयिक-द्रव्यावीचिकमरण को नैरयिक-द्रव्यावीचिकमरण किसलिए कहते हैं ? गौतम ! नारक-द्रव्य रूप से वर्तमान नैरयिक ने जिन द्रव्यों को नारकायुष्य रूप में स्पर्श रूप से ग्रहण किया है, बन्धन रूप से बाँधा है, प्रदेशरूप से प्रक्षिप्त कर पुष्ट किया है, अनुभाग रूप से विशिष्ट रसयुक्त किया है, स्थिति-सम्पादनरूप से स्थापित किया है, जीवप्रदेशों में निविष्ट किया है, अभिनिविष्ट किया है तथा जो द्रव्य अभिसमन्वागत है, उन द्रव्यों को वे प्रतिसमय निरन्तर छोड़ते रहते हैं । इस कारण से हे गौतम ! यावत् नैरयिकद्रव्यावीचिकमरण कहते हैं । इसी प्रकार यावत् देव-द्रव्यावीचिकमरण के विषय में कहना।
भगवन ! क्षेत्रावीचिकमरण कितने प्रकार का है ? गौतम ! चार प्रकार का । यथा-नैरयिकक्षेत्रावीचिक-मरण
मुनि दीपरत्नसागर कृत् "(भगवती-२) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद"
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