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________________ आगम सूत्र ५, अंगसूत्र-५, 'भगवती/व्याख्याप्रज्ञप्ति-2' शतक/वर्ग/उद्देशक/ सूत्रांक सूत्र-५७५ भगवन् ! यह लोक क्या कहलाता है-लोक का स्वरूप क्या है ? गौतम ! पंचास्तिकायों का समूहरूप ही यह लोक कहलाता है। वे पंचास्तिकाय इस प्रकार है-धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, यावत् पुद्गलास्तिकाय । भगवन् ! धर्मास्तिकाय से जीवों की क्या प्रवृत्ति होती है ? गौतम ! धर्मास्तिकाय से जीवों के आगमन, गमन, भाषा, उन्मेष, मनोयोग, वचनयोग और काययोग प्रवृत्त होते हैं । ये और इस प्रकार के जितने भी चल भाव हैं वे सब धर्मास्तिकाय द्वारा प्रवृत्त होते हैं । धर्मास्तिकाय का लक्षण गतिरूप है। भगवन् ! अधर्मास्तिकाय से जीवो की क्या प्रवृत्ति होती है ? गौतम ! अधर्मास्तिकाय से जीवों के स्थान, निषीदन, त्वग्वर्त्तन और मन को एकाग्र करना (आदि की प्रवृत्ति होती है) । ये तथा इस प्रकार के जितने भी स्थिर भाव हैं, वे सब अधर्मास्तिकाय से प्रवृत्त होते हैं । अधर्मास्तिकाय का लक्षण स्थितिरूप है । भगवन् ! आकाशास्तिकाय से जीवों और अजीवों की क्या प्रवृत्ति होती है ? गौतम! आकाशास्तिकाय, जीवद्रव्यों और अजीवद्रव्यों का आश्रयरूप होता है। सूत्र-५७६ एक परमाणु से पूर्ण या दो परमाणुओं से पूर्ण (एक आकाशप्रदेश में) सौ परमाणु भी समा सकते हैं । सौ करोड़ परमाणुओं से पूर्ण एक आकाशप्रदेश में एक हजार करोड़ परमाणु भी समा सकते हैं । सूत्र - ५७७ आकाशास्तिकाय का लक्षण अवगाहना रूप है। भगवन् ! जीवास्तिकाय से जीवों की क्या प्रवृत्ति होती है ? गौतम ! जीवास्तिकाय के द्वारा जीव अनन्त आभिनिबोधिकज्ञान की पर्यायों को, अनन्त श्रुतज्ञान की पर्यायों को प्राप्त करता है; (इत्यादि सब कथन) द्वीतिय शतक के दसवें अस्तिकाय उद्देशक के अनुसार; यावत् वह उपयोग को प्राप्त होता है, (यहाँ तक कहना चाहिए)। जीव का लक्षण उपयोग-रूप है । भगवन् ! पुद्गलास्तिकाय से जीवों की क्या प्रवृत्ति होती है ? गौतम ! पुद्गलास्तिकाय से जीवों के औदारिक, वैक्रिय, आहारक, तैजस, कार्मण, श्रोत्रेन्द्रिय, चक्षुरिन्द्रिय, घ्राणेन्द्रिय, जिह्वेन्द्रिय, स्पर्शेन्द्रिय, मनोयोग, वचनयोग, काययोग और श्वास-उच्छ्वास का ग्रहण करने की प्रवृत्ति होती है। पुद्गलास्ति-काय का लक्षण ग्रहण रूप है। सूत्र-५७८ भगवन् ! धर्मास्तिकाय का एक प्रदेश, कितने धर्मास्तिकाय के प्रदेशों द्वारा स्पृष्ट होता है ? गौतम ! वह जघन्य पद में तीन प्रदेशों से और उत्कृष्ट पद में छह प्रदेशों से स्पृष्ट होता है । अधर्मास्तिकाय के कितने प्रदेशों से स्पृष्ट होता है ? (गौतम ! वह) जघन्य पद में चार प्रदेशों से और उत्कृष्ट पद में सात अधर्मास्तिकाय प्रदेशों से स्पृष्ट होता है। वह आकाशास्तिकाय के कितने प्रदेशों से स्पृष्ट होता है ? (गौतम ! वह) सात (आकाश -) प्रदेशों से स्पृष्ट होता है । जीवास्तिकाय के कितने प्रदेशों से स्पृष्ट होता है ? अनन्त (जीव -) प्रदेशों से स्पृष्ट होता है । पुद्ग-लास्तिकाय के कितने प्रदेशों से स्पृष्ट होता है ? (गौतम ! वह) अनन्त प्रदेशों से स्पृष्ट होता है । अद्धाकाल के कितने समयों से स्पृष्ट होता है ? (गौतम ! वह) कथंचित् स्पृष्ट होता है और कथंचित् स्पृष्ट नहीं होता । यदि स्पृष्ट होता है तो नियमतः अनन्त समयों से स्पृष्ट होता है। भगवन् ! अधर्मास्तिकाय का एक प्रदेश, धर्मास्तिकाय के कितने प्रदेशों से स्पृष्ट होता है ? (गौतम !) धर्मास्तिकाय के जघन्य पद में चार और उत्कृष्ट पद में सात प्रदेशों से स्पृष्ट होता है । कितने अधर्मास्तिकाय के प्रदेशों से स्पृष्ट होता है ? जघन्य पद में तीन और उत्कृष्ट पद में छह प्रदेशों से स्पृष्ट होता है । शेष सभी वर्णन धर्मास्तिकाय के वर्णन के समान समझना । भगवन् ! धर्मास्तिकाय के कितने प्रदेशों से स्पृष्ट होता है ? कदाचित् स्पृष्ट होता है, कदाचित् स्पृष्ट नहीं होता । यदि स्पृष्ट होता है तो जघन्य पद में एक, दो, तीन या चार प्रदेशों से और उत्कृष्ट पद में सात प्रदेशो से स्पृष्ट होता है । इसी प्रकार अधर्मास्तिकाय के प्रदेशों से स्पृष्ट के विषय में जानना। (भगवन् ! आकाशास्तिकाय का एक प्रदेश) आकाशास्तिकाय के कितने प्रदेशों से (स्पृष्ट होता है ?) गौतम! मुनि दीपरत्नसागर कृत् "(भगवती-२) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 36
SR No.034672
Book TitleAgam 05 Bhagwati Sutra Part 02 Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages254
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 05, & agam_bhagwati
File Size6 MB
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