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________________ आगम सूत्र ५, अंगसूत्र- ५, 'भगवती / व्याख्याप्रज्ञप्ति-2' शतक / वर्ग / उद्देशक / सूत्रांक शक्य नहीं है । आयुष्मन् ! समुद्र के उस पार रूपी पदार्थ हैं न? हाँ, हैं । आयुष्मन् ! क्या तुम समुद्र के उस पार रहे हुए पदार्थों के रूप को देखते हो ? यह देखना शक्य नहीं है । आयुष्मन् ! क्या देवलोकों में रूपी पदार्थ हैं ? हाँ, हैं । आयुष्मन् ! क्या तुम देवलोकगत पदार्थों के रूपों को देखते हो? यह बात शक्य नहीं है । इसी तरह, हे आयुष्मन् ! यदि मैं, तुम, या अन्य कोई भी छद्मस्थ मनुष्य, जिन पदार्थों को नहीं जानता या नहीं देखता, उन सब का अस्तित्व नहीं होता, ऐसा माना जाए तो तुम्हारी मान्यतानुसार लोक में बहुत-से पदार्थों का अस्तित्व ही नहीं रहेगा, यों कहकर मक श्रमणोपासक ने उन अन्यतीर्थिकों को प्रतिहत कर दिया। उन्हें निरुत्तर करके वह गुणशील उद्यान में श्रमण भगवान महावीर स्वामी के निकट आया और पाँच प्रकार के अभिगम से श्रमण भगवान महावीर की सेवा में पहुँचकर यावत् पर्युपासना करने लगा । श्रमण भगवान महावीर ने कहा- हे मटुक तुमने उन अन्यतीर्थिकों को जो उत्तर दिया, वह समीचीन है, मटुक तुमने उन अन्यतीर्थिकों को यथार्थ उत्तर दिया है । हे मद्रुक ! जो व्यक्ति बिना जाने, बिना देखे तथा बिना सूने किसी अज्ञात, अदृष्ट, अश्रुत, असम्मत एवं अविज्ञात अर्थ, हेतु, प्रश्न या विवेचन का उत्तर बहुत से मनुष्यों के बीच में कहता है, बतलाता है यावत् उपदेश देता है, वह अरहन्त भगवंतों की आशातना में प्रवृत्त होता है, वह अर्हत्प्रज्ञप्त धर्म की, केवलियों की तथा केवलि प्ररूपित धर्म की भी आशातना करता है। हे मद्रुक तुमने उन अन्यतीर्थिकों को इस प्रकार का उत्तर देकर बहुत अच्छा कार्य किया है। मद्रुक तुमने बहुत उत्तम कार्य किया, यावत् इस प्रकार का उत्तर दिया। श्रमण भगवान महावीर के इस कथन को सूनकर हृष्ट-तुष्ट यावत् मद्रुक श्रमणोपासक ने श्रमण भगवान महावीर को वन्दना-नमस्कार किया और न अति निकट और न अति दूर बैठकर यावत् पर्युपासना करने लगा । तदनन्तर श्रमण भगवान महावीर ने मद्रुक श्रमणोपासक तथा उस परीषद् को धर्मकथा कही । यावत् परीषद् लौट गई तत्पश्चात् मद्रुक श्रमणोपासक ने श्रमण भगवान महावीर से यावत् धर्मोपदेश सूना, और उसे अवधारण करके अतीव हर्षित एवं सन्तुष्ट हुआ। फिर उसने भगवान से प्रश्न पूछे, अर्थ जाने, और खड़े होकर श्रमण भगवान महावीर को वन्दन- नमस्कार किया यावत् अपने घर लौट गया। गौतम स्वामी ने वन्दन-नमस्कार किया और पूछा- भगवन् ! क्या मद्रुक श्रमणोपासक आप देवानुप्रिय के पास मुण्डित होकर यावत् प्रव्रज्या ग्रहण करने में समर्थ है ? हे गौतम! यह अर्थ समर्थ नहीं है । इत्यादि सब वर्णन शंख श्रमणोपासक के समान यावत् अरुणाभ विमान में देवरूप में उत्पन्न होकर, यावत् सर्व दुःखों का अन्त करेगा सूत्र - ७४५ भगवन् ! महर्द्धिक यावत् महासुख वाला देव, हजार रूपों की विकुर्वणा करके परस्पर एक दूसरे के साथ संग्राम करने में समर्थ है ? हाँ, गौतम ! समर्थ है। भगवन् ! वैक्रियकृत वे शरीर, एक ही जीव के साथ सम्बद्ध होते हैं, या अनेक जीवों के साथ सम्बद्ध ? गौतम ! एक ही जीव से सम्बद्ध होते हैं, अनेक जीवों के साथ नहीं । भगवन् उन शरीरों के बीच का अन्तराल भाग क्या एक जीव से सम्बद्ध होता है, या अनेक जीवों से ? गौतम वह एक ही जीव से सम्बद्ध होता है, अनेक जीवों से सम्बद्ध नहीं। भगवन् ! कोई पुरुष उन वैक्रियकृत शरीरों के अन्तरालों को अपने हाथ या पैर से स्पर्श करता हुआ, यावत् तीक्ष्ण शस्त्र से छेदन करता हुआ कुछ भी पीड़ा उत्पन्न कर सकता है ? गौतम आठवें शतक के तृतीय उद्देशक के अनुसार समझना; यावत् उन पर शस्त्र नहीं लग (चल) सकता। ! ! सूत्र - ७४६ भगवन् ! क्या देवों और असुरों में देवासुर संग्राम होता है ? हाँ, गौतम ! होता है। भगवन् ! देवों और असुरों में संग्राम छिड़ जाने पर कौन-सी वस्तु, उन देवों के श्रेष्ठ प्रहरण के रूप में परिमत होती है ? गौतम ! वे देव, जिस तृण, काष्ठ, पत्ता या कंकर आदि को स्पर्श करते हैं, वही वस्तु उन देवों के शस्त्ररत्न के रूप में परिणत हो जाती है। भगवन् जिस प्रकार देवों के लिए कोई भी वस्तु स्पर्शमात्र से शस्त्ररत्न के रूप में परिणत हो जाती है, क्या उसी प्रकार असुरकुमारदेवों के भी होती है? गौतम उनके लिए यह बात शक्य नहीं वैक्रियकृत शस्त्ररत्न होते हैं । ! है क्योंकि असुरकुमार देवों के तो सदा मुनि दीपरत्नसागर कृत् " ( भगवती २ ) आगमसूत्र - हिन्द- अनुवाद” I Page 112
SR No.034672
Book TitleAgam 05 Bhagwati Sutra Part 02 Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages254
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 05, & agam_bhagwati
File Size6 MB
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