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________________ आगम सूत्र ५, अंगसूत्र-५, 'भगवती/व्याख्याप्रज्ञप्ति-1' शतक/ शतकशतक /उद्देशक/ सूत्रांक गौतम ! शक्रेन्द्र का ऊपर जाने का काल और चमरेन्द्र का नीचे जाने का काल, ये दोनों तुल्य हैं और सबसे कम हैं। शक्रेन्द्र का नीचे जाने का काल और वज्र का ऊपर जाने का काल, ये दोनों काल तुल्य हैं और (पूर्वोक्त काल से) संख्येयगुणा अधिक है । (इसी तरह) चमरेन्द्र का ऊपर जाने का काल और वज्र का नीचे जाने का काल, ये दोनों काल तुल्य हैं और (पूर्वोक्त काल से) विशेषाधिक हैं। सूत्र-१७६ इसके पश्चात् वज्र-(प्रहार) के भय से विमुक्त बना हुआ, देवेन्द्र देवराज शक्र के द्वारा महान् अपमान से अपमानित हुआ, चिन्ता और शोक के समुद्र में प्रविष्ट असुरेन्द्र असुरराज चमर, मानसिक संकल्प नष्ट हो जाने से मुख को हथेली पर रखे, दृष्टि को भूमि में गड़ाए हए आर्तध्यान करता हआ, चमरचंचा नामक राजधानी में सुधर्मा सभा में. चमर नामक सिंहासन पर विचार करने लगा। उस समय नष्ट मानसिक संकल्प वाले यावत आर्तध्यान करते हए असुरेन्द्र असुरराज चमर को, सामानिक परीषद् में उत्पन्न देवों ने देखा तो वे हाथ जोड़कर यावत् इस प्रकार बोले- हे देवानुप्रिय ! आज आपका मानसिक संकल्प नष्ट हो गया हो, यावत् क्यों चिन्ता में डूबे हैं ? इस पर असुरेन्द्र असुरराज चमर ने, उन सामानिक परिषद् में उत्पन्न देवों से इस प्रकार कहा- हे देवानुप्रियो ! मैंने स्वयमेव श्रमण भगवान महावीर का आश्रय लेकर, देवेन्द्र देवराज शक्र को उसकी शोभा से नष्टभ्रष्ट करने का मनोगत संकल्प किया था । उससे अत्यन्त कुपित होकर मुझे मारने के लिए शक्रेन्द्र ने मुझ पर वज्र फैंका था । परन्तु देवानुप्रियो ! भला हो, श्रमण भगवान महावीर का, जिनके प्रभाव से मैं, पीड़ा से रहित तथा परिताप-रहित रहा; और सुखशान्ति से युक्त होकर यहाँ आ पाया हूँ, यहाँ समवसृत हुआ हूँ, यहाँ पहुँचा हूँ और आज यहाँ मौजूद हूँ | अतः हे देवानुप्रियो ! हम सब चलें और श्रमण भगवान महावीर को वन्दननमस्कार करें यावत् उनकी पर्युपासना करें। यों विचार करके वह चमरेन्द्र अपने चौसठ हजार सामानिक देवों के साथ, यावत् सर्वऋद्धि-पूर्वक यावत् उस श्रेष्ठ अशोकवृक्ष के नीचे, जहाँ मैं था, वहाँ मेरे समीप आया । तीन बार दाहिनी ओर से मेरी प्रदक्षिणा की । यावत् वन्दना-नमस्कार करके बोला- हे भगवन् ! आपका आश्रय लेकर मैं स्वयमेव देवेन्द्र देवराज शक्र को, उसकी शोभा से नष्टभ्रष्ट करने के लिए गया था, यावत् आप देवानुप्रिय का भला हो, कि जिनके प्रभाव से मैं क्लेश-रहित होकर यावत् विचरण कर रहा हूँ । अतः हे देवानुप्रिय ! मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ | यावत् ईशानकोण में चला गया । फिर यावत् उसने बत्तीस-विधा से सम्बद्ध नाट्यविधि दिखलाई। फिर वह जिस दिशा से आया था, उसी दिशा में वापस लौट गया हे गौतम ! इस प्रकार से असुरेन्द्र असुरराज चमर को वह दिव्य देवऋद्धि, दिव्य देवद्युति एवं दिव्य देवप्रभाव उपलब्ध हआ है, प्राप्त हुआ है और अभिसमन्वागत हुआ है । चमरेन्द्र की स्थिति एक सागरोपम की है और वह वहाँ से च्यवकर महाविदेह क्षेत्र में जन्म लेकर सिद्ध होगा, यावत् समस्त दुःखों का अन्त करेगा। सूत्र - १७७ ___भगवन् ! असुरकुमार देव यावत् सौधर्मकल्प तक ऊपर किस कारण से जाते हैं ? गौतम ! (देवलोक में) तत्काल उत्पन्न तथा चरमभवस्थ उन देवों को इस प्रकार का, इस रूप का आध्यात्मिक यावत् मनोगत संकल्प उत्पन्न होता है-अहो ! हमने दिव्य देवऋद्धि यावत् उपलब्ध की है, प्राप्त की है, अभिसमन्वागत की है । जैसी दिव्य देवऋद्धि हमने यावत् उपलब्ध की है, यावत् अभिसमन्वागत की है, वैसी ही दिव्य देवऋद्धि यावत् देवेन्द्र देवराज शक्र ने उपलब्ध की है यावत् अभिसमन्वागत की है, (इसी प्रकार) जैसी दिव्य देवऋद्धि यावत् देवेन्द्र देवराज शक्र ने उपलब्ध की है यावत् अभिसमन्वागत की है, वैसी ही दिव्य देवऋद्धि यावत् हमने भी उपलब्ध यावत् अभिसमन्वागत की है। अतः हम जाएं और देवेन्द्र देवराज शक्र के निकट (सम्मुख) प्रकट हों एवं देवेन्द्र देवराज शक्र द्वारा प्राप्त यावत् अभिसमन्वागत उस दिव्य देवऋद्धि यावत् दिव्य देवप्रभाव को देखें; तथा हमारे द्वारा लब्ध, प्राप्त एवं अभिसमन्वागत उस दिव्य देवऋद्धि यावत् दिव्य देवप्रभाव को देवेन्द्र देवराज शक्र देखें । देवेन्द्र देवराज शक्र द्वारा लब्ध यावत् अभिसमन्वागत दिव्य देवऋद्धि यावत् दिव्य देवप्रभाव को हम जानें, और हमारे द्वारा उपलब्ध यावत् मुनि दीपरत्नसागर कृत् "(भगवती) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 74
SR No.034671
Book TitleAgam 05 Bhagwati Sutra Part 01 Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages250
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 05, & agam_bhagwati
File Size6 MB
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