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________________ आगम सूत्र ५, अंगसूत्र-५, 'भगवती/व्याख्याप्रज्ञप्ति-1' शतक/ शतकशतक/उद्देशक/ सूत्रांक वनराजि, ये सब परीगृहीत किये हुए होते हैं । फिर देवकुल, सभा, आश्रम, प्याऊ, स्तूभ, खाई, खाई, ये भी परीगृहीत की होती है तथा प्राकार, अट्टालक, चरिका, द्वार, गोपुर ये सब परीगृहीत किये होते हैं। इनके द्वारा प्रासाद, घर, सरण, लयन, आपण परीगृहीत किये जाते हैं । शृंगाटक, त्रिक, चतुष्क, चत्वर, चतुर्मुख, महापथ परिगृहीत होते हैं । शकट, रथ, यान, युग्य, गिल्ली, थिल्ली, शिविका, स्यन्दमानिका आदि परि-गृहीत किये होते हैं । लौही, लोहे की कड़ाही, कुड़छी आदि चीजें परिग्रहरूप में गृहीत होती है । इनके द्वारा भवन भी परीगृहीत होते हैं । देवदेवियाँ, मनुष्य नरनारियाँ, एवं तिर्यंच नर-मादाएं, आसन, शयन, खण्ड, भाण्ड एवं सचित्त, अचित्त और मिश्र द्रव्य परीगृहीत होते हैं। इस कारण से ये पंचेन्द्रिय तिर्यंचयोनिक जीव आरम्भ और परीग्रह से युक्त होते हैं, किन्त अनारम्भी-अपरिग्रही नहीं होते। तिर्यंचयोनिक जीवों के समान मनष्यों के विषय में भी कहना। जिस प्रकार भवनवासी देवों के विषय में कहा, वैसे ही वाणव्यन्तर, ज्योतिष्क और वैमानिक देवों के (आरम्भ-परिग्रहयुक्त होने के) विषय में (सहेतुक) कहना चाहिए। सूत्र-२६१ पाँच हेतु कहे गए हैं, (१) हेतु को जानता है, (२) हेतु को देखता, (३) हेतु का बोध प्राप्त करता- (४) हेतु का अभिसमागम-अभिमुख होकर सम्यक् रूप से प्राप्त करता है, और (५) हेतुयुक्त छद्मस्थमरणपूर्वक मरता है। पाँच हेतु (प्रकारान्तर से) कहे गए हैं । वे इस प्रकार-(१) हेतु द्वारा सम्यक् जानता है, (२) हेतु से देखता है; (३) हेतु द्वारा श्रद्धा करता है, (४) हेतु द्वारा सम्यक्तया प्राप्त करता है, और (५) हेतु से छद्मस्थमरण मरता है। पाँच हेतु (मिथ्यादृष्टि की अपेक्षा से) कहे गए हैं । यथा-(१) हेतु को नहीं जानता, (२) हेतु को नहीं देखता, (३) हेतु की बोधप्राप्ति नहीं करता, (४) हेतु को प्राप्त नहीं करता, और (५) हेतुयुक्त अज्ञानमरण मरता है। पाँच हेतु हैं । यथा-हेतु से नहीं जानता, यावत् हेतु से अज्ञानमरण मरता है। पाँच अहेतु हैं-अहेतु को जानता है; यावत् अहेतुयुक्त केवलिमरण मरता है। पाँच अहेतु हैं-अहेतु जानता है, यावत् अहेतु द्वारा केवलिमरण मरता है। पाँच अहेतु हैं-अहेतु को नहीं जानता, यावत् अहेतुयुक्त छद्मस्थमरण मरता है। पाँच अहेतु कहे गए हैं-(१) अहेतु से नहीं जानता, यावत् (५) अहेतु से छद्मस्थमरण मरता है । हे भगवन् यह इसी प्रकार है, हे भगवन् ! यह इसी प्रकार है। शतक-५ - उद्देशक-८ सूत्र - २६२ उस काल और उस समय में श्रमण भगवान महावीर पधारे । परीषद् दर्शन के लिए गई, यावत् धर्मोपदेश श्रवण कर वापस लौट गई। उस काल और उस समय में श्रमण भगवान महावीर के अन्तेवासी नारदपुत्र नाम के अनगार थे । वे प्रकृतिभद्र थे यावत् आत्मा को भावित करते विचरते थे । उस काल और उस समय में श्रमण भगवान महावीर के अन्तेवासी निर्ग्रन्थीपुत्र अनगार थे। वे प्रकृति से भद्र थे, यावत् विचरण करते थे। ___एक बार निर्ग्रन्थीपुत्र अनगार, जहाँ नारदपुत्र नामक अनगार थे, वहाँ आए और उनके पास आकर उन्होंने पूछा-हे आर्य ! तुम्हारे मतानुसार सब पुद्गल क्या सार्द्ध, समध्य और सप्रदेश हैं, अथवा अनर्द्ध, अमध्य और अप्रदेश हैं ? नारदपुत्र अनगार ने निर्ग्रन्थीपुत्र अनगार से कहा-आर्य; मेरे मतानुसार सभी पुद्गल सार्द्ध, समध्य और सप्रदेश हैं, किन्तु अनर्द्ध, अमध्य और अप्रदेश नहीं हैं। तत्पश्चात् उन निर्ग्रन्थीपुत्र अनगार ने नारदपुत्र अनगार से यों कहा-हे आर्य! यदि तुम्हारे मतानुसार सभी पुद्गल सार्द्ध, समध्य और सप्रदेश हैं, अनर्द्ध, अमध्य और अप्रदेश नहीं हैं, तो क्या, हे आर्य ! द्रव्यादेश से वे सर्वपुद्गल सार्द्ध, समध्य और सप्रदेश हैं, किन्तु अनर्द्ध, अमध्य और अप्रदेश नहीं हैं ? अथवा हे आर्य ! क्या क्षेत्रादेश से सभी पुद्गल सार्द्ध, समध्य और सप्रदेश आदि पूर्ववत् हैं ? या कालादेश और भावादेश से समस्त पुद्गल उसी प्रकार हैं ? तदनन्तर वह नारदपुत्र अनगार, निर्ग्रन्थीपुत्र अनगार से यों कहने लगे-हे आर्य ! मेरे मतानुसार, द्रव्यादेश से भी सभी पुद्गल सार्द्ध, समध्य और सप्रदेश हैं, किन्तु अनर्द्ध, अमध्य और अप्रदेश नहीं हैं। मुनि दीपरत्नसागर कृत् "(भगवती) आगमसूत्र-हिन्द-अनुवाद" Page 105
SR No.034671
Book TitleAgam 05 Bhagwati Sutra Part 01 Hindi Anuwad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherDipratnasagar, Deepratnasagar
Publication Year2019
Total Pages250
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 05, & agam_bhagwati
File Size6 MB
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