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________________ खोदनेपर कोई एक कठिन वस्तु कुदारीसे लगी। शीघ्र ही कुदारीको बाहर निकालनेपर उसमें रक्त लगा हुआ देखकर वह व्याकुल हुआ। इस आश्चार्यपूर्ण घटनाको देखकर सभी लोग चारों ओरसे हलके हाथसे खोदकर बालूको निकाल कर क्या देखते हैं कि समाधिस्थित सदाशिवेन्द्रसरस्वती प्रसुप्तकी नाई बालके मध्यमें सोये हुए हैं। उन्हें वैसा देखकर वे सबके सब आश्चर्यनिमम हो गये । इस योगिराजका प्रभाव अचिन्तनीय है, यों कहते हुए उन्होंने उनके शरीरको बालूसे बाहर निकाला । निकालते ही उनकी समाधि टूट गई। वे सोकर जागे हुए की नाई नेत्रोंको खोलकर उस स्थानसे उठकर अपने इच्छानुसार कहीं चले गये । ___एक समयकी घटना है कि करूरनगरके पासके गांवमें खूब पके हुए धानोंको काटकर उनका एक स्थानमें ढेर लगाकर रात्रिमें उनकी रक्षाके लिए भृत्योंको नियुक्तकर क्षेत्रस्वामी अपने घर चला गया। उसके चले जानेपर रक्षक सावधानीसे धानके ढेरकी रक्षा करने लगे। कृष्ण पक्षकी रात्रिमें, जब कि कोई भी वस्तु नहीं दिखाई देती थी, सदाशिव अपने इच्छानुसार कहींसे आ रहे थे और उसी धानके ढेरसे टकराकर गिर पड़े। दूसरी ओर पहरा दे रहे भृत्योंने समझा कि यह चोर है और वे बड़े-बड़े डंडे लेकर उन्हें मारनेके लिए दौड़े और धानोंके ढेरमें सुखसे सोये हुए सदाशिवेन्द्रको पीटनेके लिए उद्यत हो गये । उन्होंने उन्हें मारनेके लिए जैसे लठे उठाये योगीन्द्रके अलौकिक प्रभावसे वे वैसेके वैसे उठाये रह गये । वे रावभर यों ही स्तम्भित रहे। प्रातःकाल क्षेत्रका स्वामी आया। वह अपने भृत्योंकी दशाको देखकर आश्चर्ययुक्त होकर उनसे बोला- यह क्या बात है ? उन्होंने कहा-स्वामिन् , हम लोग क्रोधसे इस महात्माको अज्ञानपूर्वक मारनेके लिए प्रवृत्त हुए । उसीका यह फल है । अब क्या करें? कैसे स्वस्थ हों ! उन लोगों की परस्पर बातचीतसे योगीन्द्रकी समाधि टूट गई। वे आँखें खोलकर उस स्थानसे उठकर धीरे धीरे जहाँसे आये थे, चले गये। उनके चले जानेपर सब भृत्य स्वस्थ हो गये। उन्होंने योगिराजकी अपारकरुणाशालिता और अचिन्तनीय महिमाकी भूरिभूरि प्रशंसा की । एक समयकी बात है कि परमात्मनिष्ठ योगिराज कहीं जंगलमें घूम रहे थे। उन्हें राजाधिकारीके लिए लकड़ियां इकट्ठा कर रहे सेवकोंने देखा । उन लोगोंने यह सोचकर कि यह हृष्ट पुष्ट अतः बोझा ढोने योग्य है, जबरदस्ती उन्हें पकड़ा और उनके सिरपर एक बड़ा बोझा रख दिया एवं अपने ही साथ उन्हें गांवमें ले गये । राजाधिकारीके आंगनमें पहलेसे इकट्ठा की गई लक Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034618
Book TitleSiddhant Kalpvalli
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSadashivendra Saraswati
PublisherAchyut Granthmala
Publication Year1941
Total Pages136
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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