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________________ श्वेताम्बर तेरापंप-मत समीक्षा । ८३ +++ ++ + ++ ++ + + ++++++ म्हे मालूम हो जायगा, कि-इस कालकी अपेक्षा धुरंधर आचायौँका-पवित्र मुनिराजोंका सामेला (सामैया ) गामके मुताबिक हों तो इसमें आश्चर्यकी बात ही क्या है ? क्या मुनिराजोंको खोजेके मुडदेकी तरह शहरमें लाना अच्छा समझते हो ? यदि ऐसाही है, तो यह वात आपलोगोंको ही मुवारक रहे । खुशीसे तुम्हारे साधुओंको उस मुताबिक ले जाया करो।। इन लोगोंके इस ट्रेक्टसे विदित होता है कि-यह देक्ट इन लोगोंने सिर्फ सची बातको उडा देनेके लिये ही निकाला है। अगर ऐसा न होता तो वे इसमें इतनी असत्यपूर्ण बातें कभी न लिखते । चर्चा के विषयमें उन्होंने जो वृत्तान्त लिखा है, वह असत्यतासे भरा हुआ है । भवका डर रखनेवाला पुरुष कभी ऐसी उटपटांग झूठी बातें प्रकाशित नहीं कर सकता। शिरेमल श्रावकके साथमें, आचार्यमहाराजके वार्तालाप होनेकी बात ८-९ पृष्ठमें लिखी है, वह भी ऐसी ही झूठी है। शिरेमलसे ऐसी बात कभी नहीं हुई है । इस बातकी साक्षी-गवाही पंडित परमानन्दजी वगैरह वेही महानुभाव देसकते हैं, जो उस चर्चाके समय हरबख्त उपस्थित रहा करते थे। पालीके तेरापंथीभाई, अपने ट्रेक्टके १६ वे पृष्ठमें लिखते हैं कि-"उपरोक्त तेवीस प्रश्न मारवाडी भाषा मिश्रित लिखकर....दिये ।" हम पूछते हैं कि यह मारवाडी भाषाकी मिश्री डाली किसमें ? प्रधान एक भाषा भी तो होनी चाहिये । तुम्हारे प्रश्नोंमें खास एक भाषा तो कोई है नहीं । छप्पनमसालेकी दाल जैसे बनावे, वैसे ही विचारे तेईस प्रश्नोंकी मट्टी खराब की है । अच्छा, यह भी कुछ कह सकते हो कि-मारवाडी भाषाकी मिश्री किस लिये डाली?।। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034617
Book TitleShwetambar Terapanth Mat Samiksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVidyavijay
PublisherHarshchandra Bhurabhai Shah
Publication Year1914
Total Pages98
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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