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________________ श्वेताम्पर तेरापंथ-मत समीक्षा। ५५ 卷份份我分分母分化分女少女分分各後分分母 उत्तर-जिनप्रतिमा जिनसमान है, तत्संबंधि रायपसेणी सूत्रके १९० पृष्टमें 'धूवं दाउणं जिणवराणं' ऐसा पाठ है। तथा जीवाभिगम सूत्रकी लिखी हुई प्रति ( जो आचार्य महाराजके पास है ) के १९१ वे पृष्टमें भी वही पाठ है । इस पा, उका मतलब यह है कि-जिनवरको धुप दे करके । इसमें मूर्तिको जिनवर कहा, इससेही सिद्ध होता है कि-जिनप्रतिमा जिन समान है । इसके शिवाय ज्ञातासूत्रके-१२५५ वे पृष्ठमें 'जेणेव जिणघरे' ऐसा पाठ है । यहाँपर भी जिनप्रतिमाके घरको जिनघर कहा है । इत्यादि बातोंसें जिनसमान कहनेमें जराभी आपत्ति नहीं आती है। प्रश्न-१५ आचारंगरे पेला अध्येनरा पेला उद्देशामें केयोके जीवरी हंस्या कियां जनममरणरो मुकावोपरुपे तणने अहेत अबोधरो कारण केयो तो फेर आप धर्म देवरे वास्ते हस्या कर का उपदेश केश दीराते हो। ___ उत्तर-आचारांग के पहिले अध्ययनके पहिले उद्देशेमें तुम्हारे पूछे मुताविक प्रश्नका पाठ नहीं है । अतएव उत्तरही देनेकी आवश्यक नहीं है । तथापि तुम्हारे पर दया आनेसें तथा तुम्हारी भूल सुधारनेके लिये दूसरे उद्देशेका पाठ, जोकि तुम्हारे पूछे हुए प्रश्न संबंधि है, यहाँ दे करके यथार्थ अर्थ दिखलाता हुँ । देखों, वहपाठ पृष्ठ २९ में यह है: "श्मस्स चेव जीविअस्स परिवंदणमाणण पूअणाण, जाइ-मरण-मोअणाण दुक्खपडिग्घायहेउं से सयमेय पुढविसत्थं समारंभइ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034617
Book TitleShwetambar Terapanth Mat Samiksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVidyavijay
PublisherHarshchandra Bhurabhai Shah
Publication Year1914
Total Pages98
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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