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________________ श्वेताम्बर तेसपंथ-मत समीक्षा । १७ 的分分合合令色分分合合分分分分分外的 मत बने रहो । पशुओंसे तुम्हारेमें कुछ भी बुद्धि अच्छी समझते हो तो उस बुद्धिका उपयोग, तत्चके विचार करनेमें करो । गदहेका पूंछ पकडा सो पकडा, ऐसा मत करो। स्वयं अपनी बुद्धिसे सार असारका, नव-अतत्त्वका, अच्छे-बुरेका विचार करो।जो बात अच्छी लगे, उसको ग्रहण करो। शास्त्र विरुद्ध कल्पनाएं करके अनन्त संसारी मत बनो । जी तो चाहता है कि-तुम्हारी सभी शशास्त्र विरुद्ध कल्पनाओंका खण्डन किया जाय। परन्तु जो खण्डित है, उसका खण्डन क्या करना ? । तुम्हारे मन्तव्योंमें प्रत्यक्ष निर्दयता दिखाई दे रही है-प्रत्यक्ष अधर्म दिखाई दे रहा है, तो फिर उसके खण्डनके लिये अधिक कोशिश करनेकी आवश्यकता ही क्या है ?। और बहुतसी तुम्हारी अज्ञानता, तुम्हारे तेईस प्रश्नोंके उत्तरमें दिखलाई ही दी है, इस लिये अधिक न लिख करके यही लिखना काफी समझते हैं कि-कुछ पढो और ज्ञान प्राप्त करो, जिससे तुम्हें स्वयं मालूम हो जायगा कि--तुम्हारे भिखुनजीने तथा और साधुओंने जो २ प्ररूपणाएं की हैं, वे सब शास्त्र विरुद्ध की हैं। उन लोगोंने तुमको अपनी जालमें फँसा करके दुर्गतिमें लेजानेकी कोशिशकी है । इस लिये समझना हो तो समझ लो, उस दुर्गतिदायक ढोंचेको छडदो, बस इतनाही लिख करके अब पालीके तेरापंथिओंने हमारे आचार्य महाराज तथा उपाध्यायजी महाराजके साथ गत वैशाख शुक्लमें, जो चर्चाकी थी, उसका सारा वृत्तान्त यहां देता हूं। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034617
Book TitleShwetambar Terapanth Mat Samiksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVidyavijay
PublisherHarshchandra Bhurabhai Shah
Publication Year1914
Total Pages98
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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