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________________ १०१ ભારત કે સ્વાધીન બનાઓ · ५५-जना जननी ने उसको व्यर्थ किया जिसने न विजय संसार, छेड़ कर स्वतंत्रता की तान । अनूठी वीरोचित धज धार, पिया जिसने न मातृ-गुण-गान॥१॥ रहा जो जीवन भर परतंत्र, मिटाकर अतुल आर्य अभिमान। किया जिसने न स्वदेश स्वतंत्र, शेर शिवराज-प्रताप समान॥२॥ देख कर होते अत्याचार, न ली जिसने कर में करबाल । रहा जो भेष जनाना धार, जनानों की दिखलाता चाल ॥३॥ न फड़काये जिसने निज अङ्ग, हृदय में विपुल वीर व्रतधार । जमा कर देशप्रेम का रंग, किया जिसने न शक्ति संचार ॥४॥ धरा धन धाम स्वजन रक्षार्थ, कभी जो हो पाया न समर्थ । न निकला जिससे कोई स्वार्थ, जना जननी ने उसको व्यर्थ ॥५॥ ( " पारस।" मासिमा सेम:-श्रीयुत ४५४५७ ) ५६-भारत को स्वाधीन बनाओ वीर-वेश से सज कर वीरो, रण प्रांगण में जाओ। प्रलयंकारी, गर्जन कर के, रिपु को तुम दहलाओ॥ ___ भारत को स्वाधीन बनाओ! रिपुकोतुम दहलाओअथवा,भारत पर बलिजाओ। समरांगण से पीठ मोड़ मत, मा का दूध लजाओ। __ भारत को स्वाधीन बनाओ! मरते हो मर जाओ रण में, वीरादर्श दिखाओ। अथवा रण-विजयी हो भारतको स्वाधीन बनाओ। ( "वा२सश" भासिमा मि-श्री. विजेरी, विशा२६५) Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034613
Book TitleShubh Sangraha Part 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhikshu Akhandanand
PublisherSastu Sahityavardhak Karyalay
Publication Year1929
Total Pages416
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size24 MB
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