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________________ १९२ सद्धममण्डनम् । और दशविध यति धर्मका अनुष्ठान करना आदि भगवानकी आज्ञामें है परन्तु साधुके समान वेष बनाना निर्दोष आहार लेना भाण्डोपकरण रखना इत्यादि काय्य वीतरागकी आज्ञामें नहीं है इन कार्यो को ११ वी प्रतिमाधारी श्रावक अपनी इच्छासे करता है अतः ११ वी प्रतिमाधारीका साधुके समान वेष बनाना, भाण्डोपकरण रखना, और पारणेके दिन सूझता आहार लेना यह सब एकान्त पापमें है धर्म या पुण्य नहीं है। इसका क्या उत्तर ? (प्ररूपक) एग्यारहवीं प्रतिमाधारी श्रावकके लिये दशाश्रुत स्कन्ध सूत्रमें साधुके समान वेष बनाना, धार्मिक भाण्डोपकरण रखना और पारणेके दिन सूझता आहार लेना, ये सब विधान किये गये हैं उस विधानके अनुसार ही एग्यारहवीं प्रतिमाधारी श्रावक साधुके समान वेष बनाता है, भाण्डोपकरण रखला है और पारणेके दिन सूझता आहार लेता है अतः ११ वी प्रतिमाधारीके ये सब कार्य वीतरागकी आज्ञामें है अपनी इच्छासे नहीं हैं इसलिये इन कार्योंमें एकान्त पाप कहना मिथ्यावादियोंका कार्य है। सातवी प्रतिमामें जो आरम्भका त्याग नहीं होता उसका दृष्टान्त देकर ११ वों प्रतिमामें भाण्डोपकरण रखने आदिको आज्ञा बाहर कहना भी अज्ञान है क्योंकि सातवी प्रतिमा आरम्भ करने का विधान शास्त्रमें नहीं किया गया है इसलिये सातवी प्रतिमाधारीका आरम्भ करना अपनी इच्छासे है शास्त्रकी आज्ञासे नहीं परन्तु ११ वी प्रतिमामें भाण्डोपकरण रखना, साधुके सदृश वेष बनाना और पारणेके दिन सूझता आहार लेना शास्त्रकी आज्ञानुसार है अपनी इच्छासे नहीं अतः यह सब आरम्भके समान एकान्त पापमें नहीं हैं। सातवीं प्रतिमामें "आरम्भे अपरिणाते भवति" यह पाठ आया है इसका अर्थ यह है कि "सातवी प्रतिमाधारी आरम्भ नहीं छोड़ता किन्तु आरम्भ करता है" यह पाठ सातवीं प्रतिमाधारीको आरम्भ करनेका विधान नहीं करता किन्तु अनुवाद करता है। यदि विधान करता तो यहां यह कहा जाता कि “सातवी प्रतिमामें श्रावकको आरम्भ करना चाहिये" अत: सातवीं प्रतिमाधारीका आरम्भ अपनी इच्छासे है शास्त्रकी आज्ञासे नहीं और वह आरम्भ पहले हो से उस श्रावकमें मौजूद है परन्तु ११ वी प्रतिमामें साधुके समान वेष बनाना धार्मिक भाण्डोपकरण लेना पारणेके दिन सूझता आहार लेना यह सब शास्त्रमें विधान किये गये हैं और उस विधानके अनुसार ही ११ वी प्रतिमाधारी इन सब कार्यों को करता है और ये सब बाते श्रावकमें पहलेसे मौजूद भी नहीं हैं किन्तु ११ बी प्रतिमामें ही शास्त्रको आज्ञा होनेसे नवीन स्वीकार की जाती हैं अत: आरम्भ का दृष्टान्त देकर ११ वी प्रतिमाधारी श्रावकके साधु तुल्य वेष बनाने, भाण्डोपकरण Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034599
Book TitleSaddharm Mandanam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJawaharlal Maharaj
PublisherTansukhdas Fusraj Duggad
Publication Year1932
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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