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________________ २९० और भी किसी प्रकारके तालको यावत् श्रवण करने की अभिलाषा मात्र भी करे. (२५७ ) ,, शंख शब्द, वांस वेणु, खरमुखी आदिके शब्द सुननेकी अभिलाषा करे. ३ (३५८),, केरा गावोंका) खाइ यावत् तलाव आदिका वहांपर जौरसे निकलाता हुवा शब्द. ( २५९ ) “काच्छा गहन, अटवी, पर्वतादि विषम स्थानसे अनेक प्रकारके होते हुवे शब्द." (२६० ) "ग्राम,नगर, यावत् सन्निवेशके कोलाहल शब्द." ( २६१ ) ग्राममें अग्नि, यावत् सन्निवेशमें अग्नि आदिसे म. हान् शब्द. ( २६२ ) ग्रामको बद-नाश, यावत् सन्निवेशका बदका शब्द. ( २६३ ) अश्वादिका क्रीडा स्थान में होता हुवा शब्द. ( २६४ ) चौरादिकी घातके स्थानमें होता हुवा शब्द. . ( २६५ ) अश्व, गजादिके युद्धस्थानमें " ( २६६ ) राज्याभिषेकके स्थानमें, कथगों के स्थान, पटहा. दिके स्थान, होते हुवे शब्द. ( २६७ ) “बालकोंके विनोद विलासके शब्द." उपर लिखे सब स्थानोंमें श्रोत्रंद्रियसे श्रवण कर, राग द्वेष उत्पन्न करनेवाले शब्द, मुनि सुने, अन्यको सुनावे, अन्य कोइ सुनताहो उसे अच्छा समझे. भावार्थ-ऐसे शब्द श्रवण करनेसे राग द्वेषकी वृद्धि, प्रमा
SR No.034235
Book TitleShighra Bodh Part 21 To 25
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar
PublisherSukhsagar Gyan Pracharak Sabha
Publication Year
Total Pages419
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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